कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०४१ )
जिहि औसर बिच श्वासा रोका। हरा होय तब सब जग लोका ॥
जबहि श्वास ऊपरको खींचा। महाप्रलयहो सबकी मींचा ॥
दोहा-पिंड और ब्रह्मांडमें, रंच भेद नहीं वाद।
नानक सत्यकबीरको, अब सुनिये संवाद ॥
नानक वचन
तीन लोककी कहो गुसाईं। कैसे जानि परे तन माही ॥
कहीये दयासिंधु मोहि बानी। तुम निज पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥
जिंदा वचन
हेठ चरण दैं शीश अकाशा। तीनलोक देही प्रकाशा ॥
शब्द खंड ब्रह्मांडमें सोईं। माया ब्रह्म फैल घट दोईं ॥
हमरे पदको लहै न कोई। भले बूझ तुम पारख होईं ॥
नानक वचन
चार दिशा मोहि कहो गोसाईं। सातद्वीप निज कहो बुझाईं ॥
प्रभु नौरखंड अब कहो बखानी। चंद्रशूर तन कैसी मानी ॥
जिंदा वचन
आगा पीछा दक्षिण बाना। चार दिशा देही प्रमाना ॥
साठे तीन हाथकी देही। उनचास कोटि बिसियाहै पेही ॥
नवो खंड नौ संधी जानो। पिंड अंडको लेखा मानो ॥
परवत यामें हाड लगाया। धड पास ब्रह्मांड रचाया ॥
चंद्र शूर द्वै नेत्र जगावा। देखो पीठ सुमेर बनावा ॥
नसन दिया तन भीतर जानो। पेट गंडार पिंडमें मानो ॥
नानक वचन
तत्त्व प्रकार कही तुम वानी। वाकी शब्द संधि पहिचानी ॥
सातसमुद्र कहो बखानी। तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥
जिंदा वचन
जीभ नासिका नेत्र बखानो। श्रवण नाभ गुद इंद्री मानो ॥