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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2109

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जीवधर्मबोध

( २०३१ )

दोहा-राम बढ़ावै सो बढ़े, और बढ़ै नहिं कोय ।
बलकरि बढ़ै जो रावन, पलमें डारचौ खोय ॥

चौपाई

वेद कहै जो ऐसो लेखो । ईश्वर सर्व मयी बुध देखो ॥
वेद कह कर्म कन्यौ नहिं अपन । ताको अर्थ विचारो निजमन ॥
महा करता महा भोगी जैसे । महा त्यागी पुनि जाने तैसे ॥
त्यागी महा जानिये सोई । जासु हृदय हंकार न होई ॥
जाके हृदये ऐसो बरता । मैं नाहीं कछु कर्मको करता ॥
मैं नाहीं हरि आपै आपू । सो नहिं कर्म आपनो थापू ॥
जाने ऐसो कीन विवेका । पुण्यमान पापी तेहि एका ॥
मित्र शत्रु ताके कोइ नाहीं । जहां तहां हरि आपै आहीं ॥
कोई नहीं सुख दुःखको दाता । मैं तू जग सब भ्रमकी बाता ॥
जिन विचारि लीना यह लेखा । सर्वमयी तिन ईश्वर देखा ॥
जेहि ईश्वर सब मयलखि आवै । पूरन पण फल सोई पावै ॥

रामचंद्र वचन

दोहा-जिनके हृदय विचार अस, मति न टरै हनुमंत ।
मैं सेवक चराचर, रूपराशि भगवंत ॥

चौपाई

भालू कीश कटक ले साथ । लंकापर चढ़िगे रखुनाथा ॥
सहित सेन रन रावन मारा । दोहु दिश जूझै बहुत जुझारा ॥
सुधा वृष्टि भै दोहु दल माहीं । जिये भालूकपि निश्चर नाहीं ॥
नाहीं राक्षस जिय कपि रिच्छा । ऐसी परमेश्वरकी इच्छा ॥
विष अमृत रिपु मित्र बनावै । भावे न्यारा खेल देखावै ॥
जापर कृपा करे करतारा । कन यक छनमें होय पहारा ॥