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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2104

( २०२६ )

बोधसागर

११८

जापर कृपा करे सो साईं । ताकी बाँह गहे बरियाई ॥
ब्रह्मानंद बनावै ताही । सबते श्रेष्ठ होय जिव वाही ॥
बहुविधि जिवशुभकर्म जो करई । बिन प्रभु दया कार्य नहिं सरई ॥
बार बार सो प्रभुहिं नमामी । सर्व समर्थ सर्वके स्वामी ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

अवधू कुदरतकी गति न्यारी ।

रंक नेवाज करे वह राजा भूपति करे भिखारी ।
वाते लोग हरफ नहिं लागे चंदन फूल न फूला ॥
मच्छशिकारी रमै जंगल बिच सिंह ससुंदर झूला ।
रेडरूख भयौ मलयागिर चहुँदिश फूटी बासा ॥
तीन लोक ब्रह्मांड खण्डमें देखे अन्ध तमासा ।
पंगा मेरु सुमेरु उलेंचै त्रिभुवन सुक्ता डोले ।
गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशे अनहद बानी बोले ॥
आकाशहिं बांधि पताल पठावै शेष स्वर्गपर राजे ।
कहैं कबीर राम हैं राजा जो कछु करे सो साजे ॥

चौपाई

महागृह सुनिवर तप कीने । अंत नर्कमें बासा लीने ॥
पतित जौ नर्क भोगवे लायक । कृपा कीने कीन सुरनायक ॥
जौ मैं कर्मकरन समरथा । ज्ञानसुक्ति तौ सब ममहत्था ॥
मैं हौ कौन कर्म है काको । जीव नहीं जाने परिपाको ॥
जौ यह जाने मैं कछु नाहीं । तौ अभिमान दूर दुरि जाहीं ॥

सत्यकबीर-वचन

साखी-कबीर-पैठा है सब घटनमें, बैठा है संचेत ।
जब जैसी गति चाहत है तब तैसी मति देत ॥
कबीर-बहुबंधनते बांधिया, एक बेचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जौ न छोड़ावै पीव ॥