कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०२१ )
तिमि दोषी दशकंध समाजा । नरगह सत जा कह कवि राजा ॥
परवत सम रावन बतलाई । मृदुल मनोहर सिय रघुराई ॥
शाह सिकन्दर जो यूनानी । ताने विजय कीन युग जानी ॥
जीत्यौ महि रिपु सागर बंदर । दोय शृङ्गशिर गह्यो सिकन्दर ॥
पारस देशको बकरा चीन्हा । जब सो भूमि विजयनृप कीन्हा ॥
शीसपै शाह गह्यो सो गहना । शृंगसिकन्दर ताको कहना ॥
शृंगसहित सिकन्दर सोई । तिमि रावन दशकन्धर होई ॥
यथा सिकन्दर शृंगनवाला । तिमि रावन बीसभुज दशभाला ॥
सहसबाहु ब्रह्मा चतुरानन । विष्णु चतुर्भुज अरू षट आनन ॥
पंचमुखी शिव आदि अनेका । जीवन जाने बिना विवेका ॥
ऐसहि द्रन्द परा संसारा । झूठ सांचकर कौन विचारा ॥
कालभेदको ऐसहि देखा । समुझे बिना करे सब लेखा ॥
द्रापर अन्त भो कलियुग आदी । कौरौ पंडौ भये विषादी ॥
करणराय जब बिनती कीने । परशुरामसे विद्या लीने ॥
परशुराम रघुराम जो दोई । एकै समै दोहुनको होई ॥
जाशिवन्त दुबिदा हनुमाना । शृंगी ऋषि आदिक नर नाना ॥
राजा मय मेरटको जोई । रावन शशुर कहावै सोई ॥
राजा जनक अरु सुनिमुखदेवा । व्यास वशिष्ठ जो भाषे भेवा ॥
इत्यादिक वृत्तांत बहु चाला । सो सब रामकृष्णके काला ॥
कालको भेद न कतहु मिलाया । जक्त जीव माया भरमाया ॥
झूठहु सत्य शुद्ध सो लागा । सत्यको झूठ जानी जिव त्यागा ॥
दोहा—आदम आधे दिवसलो, कीन बिहिस्त निवास ।
पांचसो वर्षसो अर्धदिन, महम्मद धर्मप्रकाश ॥
कालको मेल सिलै नहिं, सो मायाकी खोट ।
कहुं पलभरी कहुं वर्षदिन, कहु भासे युग कोट ॥