कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(२०१८)
बोधसागर
११०
जब संचट होय दोहु रूपा । ताते जीव परे भ्रम कृपा ॥
द्वंदरूप मायाको खेला । ताते जीवको ज्ञान सकेला ॥
ज्ञानते माया पंथ बिरोधी । भवसागर पद जीव प्रबोधी ॥
हिंसा कर्म बुद्धि जिव घाटी । ज्ञानद्वारे पर दीनो टाटी ॥
भोगे भोग भोगमें रहई । भोगवासना चितमें गहई ॥
भोगमें भर्मि रहा सब लोगा । आवे जाय सहे सो सोगा ॥
इति
अथ अघोर धर्मव्यौरावर्णन—चौपाई
तमगुण पर तमगुण सरसाई । धर्म अघोर परम कठिनाई ॥
नर पशु जीव सकल धरखाही । धर्म विचित्र कहो कह जाही ॥
डुराचारको अन्त अघोरी । जिमि अचार वैष्णव घोरी ॥
इति अघोरधर्म
अथ विचारणीय वार्ता
दोहा—येते धर्म बखानेछ, इनते कहूँ जो और ।
सकल त्रिगुणमय भक्त हैं, जक्तमाह सब ठौर ॥
त्रिगुणातीत जो कोय कहे, त्रिगुणातीत न होय ।
कहनको त्रिगुणातीत हो, त्रिगुणमें बांधा सोय ॥
जीवनसुक्त विदेह जो, सब तिरगुणके फन्द ।
सार शब्द लहि पार हो, तब जिव होय अनन्द ॥
चौपाई
जेते धर्म प्रचारक होही । कहो न जाय कहै का ओही ॥
जिमि नृप थापे देशन देशा । धर्म प्रचारक जगमें ऐसा ॥
एक प्रानि दुतिये मत खंडा । अपनो धर्म धारा प्रचंडा ॥
यक जकती यक भकती पाला । दोनों ते प्रभु बसे निराला ॥