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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2078

( २००० )

बोधसागर

९२

भर्म तो तहाँ लोकहो जहाँ, जीवनमुक्तको वास ॥
कहो जी तुम आये कहते, जाहुगे किस ठाँव ।
औरको उपदेश देतहो, आप समुझत नाह ॥
जानबेको कहा कहिये, कहेको पतियाय ।
कहै कबीर अनंतरधुनि उपजै, सहज शून्य समाय ॥

चौपाई

लोमस ऋषि आदिक मुनि नाना । जिनको हंस कबीर बखाना ॥
कोटिन उत्पति प्रलय जो होई । कबहुँ गर्भ नहिं आवै सोई ॥
मुक्तस्वरूप संत कह तिनको । आवागौनसूत्र नहिं जिनको ॥
सारशब्द सतगुरुको लहेऊ । जन्ममरणको संशय दहेऊ ॥
जक्तमाह जेते हैं कर्मा । सो सब मिथ्या जिवको भर्मा ॥
झूठ सत्य दोउ एकसम आहीं । यहि संसार सार कछु नाहीं ॥
उत्तम करनी जिवको करना । यद्यपि नहीं सार कछु बरना ॥
गर्भते शिशु बाहर हो जबसे । कर्मकरन लागे सो तबसे ॥
कर्मक्रिया सब तबते जागे । हाथपांव शिशु फेकन लागे ॥
हाथपांव मारन ते जाहीं । नफा होय कछु शिशुको नाहीं ॥
शिशुहि भलो कर पगमारनहै । बिन कर पग फेके दुखतन है ॥
हो बाल जब अधिक सयाना । माटी धूल खेल अरु काना ॥
ताहु कर्म नफा नहिं पावै । तऊ खेलमें घौस बितावै ॥
कर्म करत पहुंचै तरुणार्ई । लाभ कर्मते तब कछु पाई ॥
सोऊ लाभ नफा कछु नाहीं । सर्व कर्म मिथ्या है ताहीं ॥
आदि अवस्था यथा निहारी । कर्म करत बीते बयसारी ॥
कर्म करनकी बानि न होई । तौ निश्चय जिव जाय बिगोई ॥
भलो कर्म करिये तेहि काजा । जाते शुभगतिको सज साजा ॥