कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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ऐसो ईश्वरमें लौं लागे । कोऊ जगावै तऊ न जागे ॥
इति ज्ञानभूमिका
अथ सात अज्ञानभूमिकावर्णन
दोहा-अशुची है जागृतो, महा जागृती गत ।
जागृत स्वप्ना स्वप्न, जागृत पुनि स्वप्ना सुषुप्त ॥
चौपाई
प्रथम अशुचि जागत अज्ञाना । तन सुख चाह सदा अलसाना ॥
दुतिये जागृत जाहि बखाना । अहं कुलीन श्रेष्ठ गुनज्ञाना ॥
तृतिये महाजागत यौं भाषे । दोहू लोक पौरुष हम राखे ॥
ऐसो मैं गुणज्ञान निधाना । मेरे वशमें अहै फलाना ॥
चौथे जागृत स्वप्ना यांचा । जो मैं कहों सुनो सब सांचा ॥
पंचम स्वप्ना जागत भाषा । देखे स्वप्न सुरति सब राखा ॥
छठयें स्वप्न भूमिका कहई । देखे स्वप्न सुरति नहिं रहई ॥
सप्तम भूमि सुषोपति होई । सुधिवुधिरहित जीव जब सोई ॥
सातो भूमि ज्ञान उर धारो । पुनि सातो अज्ञान विचारो ॥
यक पौरीपर दूजी पौरी । होय सघनता अगिली ठौरी ॥
प्रभुमें शुभ इच्छा जब होई । सच्छास्त्रन अवलोकै सोई ॥
सच्छास्त्रनको रस भल चीखी । ताकी बुद्धि भई तब तीखी ॥
सच्छास्त्रन पठि भयौ जो पक्का । तब तो दुतिय मूगिका तक्का ॥
दुतिय भूमिका आहि विचारा । तब सत्संगतको पग धारा ॥
सत्संगत जब जीव टटोले । तब ग्रन्थनकी ग्रन्थी खोले ॥
जबलों नहिं सत्संगत जूटे । ग्रन्थनकी ग्रन्थी नहिं छूटे ॥
दुतिय भूमिमें जब जिव पागा । तब तृतियेमें हो वैरागा ॥
हठ बैराग होय जिहि काला । चौथ भूमिकामें पग डाला ॥
जब चौथीमें हठ जिव भैऊ । तब पंचम हरिपद गहिलैऊ ॥