कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९९१ )
प्राण मनो विज्ञान जो तीनी । स्वप्न स्वरूप तिन्है कहि दीनी ॥
पुनि अनंदमय कोष जो आही । रूप सुषुप्ती कहिये ताही ॥
जाग्रत रजगुन रूप कहीजै । सतगुन रूप स्वप्न कहिदीजै ॥
तमगुन रूप सुषुप्ति कहावै । देहमन्त्री गुन सुभाव बतावै ॥
पुण्यदया वांछा रजगुनकह । पुन्य पिछार विषाद तमो यह ॥
वांछा रहित सतोगुन जानी । त्रिगुन कर्म नानाविधि मानी ॥
जिव अज्ञानते आपको कहई । पुण्यपाप सब मेरो अहई ॥
ज्ञानी गुनन सुभाव सो जाने । अज्ञानी अपनो करि माने ॥
यहि बिधि जेते तनके कर्मा । सो सब मन इंद्रिके धर्मा ॥
पाँचो तत्त्व त्रिगुनते भयऊ । गुन आज्ञा शक्तिसे कहेऊ ॥
चित्तसे अज्ञान शक्ती होई । मन अरु चित्त भेद नहिं कोई ॥
सर्वे कर्म जो जगके माहीं । मनहीं केर पसारा आहीं ॥
मन माया तिरगुन न्यौहारा । जक्तमाह भ्रम जाल पसारा ॥
अथ योग और भोग दोनों मिथ्या वर्णन
दोहा—षट्दल चक्रको भेदके, योगी पौन चढ़ाय ।
दल सहस्रके कमलमें, निर्विकल्प हो जाय ॥
हो विदेह पद अमर लह, विद्यामें ठहराय ।
भे निरद्वन्द्व न कल्पना, आपमें आप समाय ॥
चौपाई
जिमि योगी तिमि भोगी देखे । कमल भेद दोनों यक लेखे ॥
द्वन्द्वदीब दोनोंको खेला । इत नरनारी उत गुर चेला ॥
योगी उरध पौन चढ़ावै । भोगी अधषानी ले आवै ॥
नादके बल योगी अविनाशी । विंदके चल भोगी सुखराशी ॥
नारिपुरुष जब भा संयोगा । दोनों मिले भोग सुख भोगा ॥
माथेसे जब माथ जुरेऊ । सिरवर कमलते बिंद उतरेऊ ॥