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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2063

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जीवधर्मबोध

( १९८५ )

स्वादी स्वादसे भिन्न सदाई । क्या गूँगा गुड़ही है जाई ॥
नयन समस्त जत्तको देखे । अपनो रूप न सो पै पेखे ॥
मुखको भास परे दरपनमें । पै मुख नहीं विचारो मनमें ॥
तत्त्वमसीगह ज्ञान जो कोई । अपनो भास आपना होई ॥
झाँई निरखी भूलि सो जाई । ताहीको आपा बतलाई ॥
जाते आवा गौनमें रहई । पारख बिना न सो पद लहई ॥
सब ऊपर गुरु पारख पद है । यह जीवके ज्ञानको हद है ॥
घट प्रकारकी भूमि कहावै । पारख गुरु सकल परखावै ॥
छिप्रा प्रथम गतागत दोई । तृतीये सो लेष्टा कह सोई ॥
चौथी भूमि शूलनी गाई । पंचम भूमि आप भौराई ॥
छठई सत्य भूमि कहि दीजै । सप्तम पारख भूमि भनीजै ॥
पारख पा कोइ पद नहीं जाना । ताकी कृपाते भय भ्रम भाना ॥
पारख बिन जीव यह भूला । ताते सहे त्रिविध तन शूला ॥

सत्यकबीर बचन—शब्द

यह जग पारख बिना भूलाना ।
निर्गुण सर्गुण द्वै कर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥
द्वैतहि ब्रह्म सकल घट व्यापै निर्गुणमें लपटाना ।
आवै जाय उपै फिर बिनशै जरि मरि कहा समाना ॥
सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना ।
जलके सूखे कमल कुमिलाना तब कहु कहा ठेकाना ॥
छवो चक्र व्रत चार चतुर्दश वेद मते अरुज्ञाना ।
बंक नालकी डोरी खैंचे योगिन युक्ति बखाना ॥
घटमें करता लोग बोलत है पाँचों तत्त्व बीलाना ।
सर्गुन विनशी निर्गुन गुन रहि तमगुन बिन कहाँ समाना ॥