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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2061

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जीवधर्मबोध

( १९८३ )

यही कर्म भक्तन मन भावै । कोइ बड़भागी तेहि मन लावै ॥
नाम समान तासुको धरते । सुक्तिवासना जिवमें बरते ॥
दोय प्रकार कहे अज्ञाना । अकरम करम करै विधिनाना ॥
अकरम सकल अकरमी केरा । करमिष्टी कर कर्म घनेरा ॥
परइच्छा निज इच्छा होई । समान विशेष कहावै सोई ॥
याहीको त्वंपद कर जानी । तामें बैँधे सकल अज्ञानी ॥
द्वै प्रकार अज्ञान उचारी । तामें फँसे सकल संसारी ॥

इति त्वंपद अज्ञान

अथ ततपद द्वैविधिको ज्ञानवर्णन-चौपाई

ततपद द्वै विधि कह सविवेका । एक विशेष समान है एका ॥
सहित उपाधि विशेष बखाना । निरउपाधि है मुक्त समाना ॥
ज्ञान विशेष ते ईश बखानी । ज्ञान समान कहावै ज्ञानी ॥
निज जनकी उपाधि सब जाना । पर उपाधि सबही पहिचाना ॥
तीन अवस्था दुःख सुखसारा । इन्द्री अरु इन्द्रिन व्यौहारा ॥
सब मिथ्यामृगजलवत जाना । सब असत्य मैं सत्य सुजाना ॥
तीन देह माया भ्रम माना । बारम्बार फुरै अज्ञाना ॥
सोई ज्ञान परोक्ष प्रमाना । ताहूमें द्वै भेद बखाना ॥
सर्व समर्थ गहे सब सत्ता । ऋद्धि सिद्धि युत जगमें वर्त्ता ॥
जो षट्गुन ईश्वर जग होई । सोई सिद्धि ईश कह सोई ॥
होनी अनहोनी करि डारा । अब समान करिये निरधारा ॥
निरउपाधि कहियत है ताही । ऋद्धि सिद्धि कछु मानत नाहीं ॥
सकल उपाधि नास्ति करिभाषी । मैं आस्तीक सर्वको साखी ॥
त्रिगुणातीत मोर व्यौहारा । विधि हरिहर नहि पावत पारा ॥
ऐसो ज्ञान जाहिके तीरा । सोई ज्ञानी ज्ञान गंभीरा ॥
यह परोक्ष द्वैविधि चितधरिये । अब अपरोक्षकि निर्णय करिये ॥