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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2055

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जीवधर्मबोध

( १९७७ )

जगमें जेते अमलको नामा । तिनके लेखे सकल हरामा ॥
तिहि मंडली मिलै जो कोई । यह सौगंध करावे सोई ॥
आजते कौल करार हमारा । कोई अमल मुखमें नहीं डारा ॥
आप न खाय न औरहि देही । नहीं बेचै न बेचावै येही ॥
कबहुँ न करे तासु व्यौहारा । अमल निकट नहीं निजु पगधारा ॥
जो कोइ ऐसो नियम गहावै । कागज परवाना लिखपावै ॥
सो परवाना निजु ढिग राखे । मूलि कबहुँ कछु अमल न चाखे ॥
जिनके मते ग्रंथ बहुतेरा । विषहू ते विष अमल बडेरा ॥
सबही अमलकि निंदा करही । टीटो टलर धर्म आचरही ॥
जो कोइ क्रियामें होय न पक्का । तेहि जमातिसे पावै धक्का ॥
यूरुम नर केते यहि माही । टीटो टलरको धर्म धराही ॥
सुसलमान साधू बहुतेरे । मांसअहार कबहु ना हेरे ॥
धर्म अहिंसा सम नहीं आना । वेदविदित सब संतन जाना ॥

नानकशाह वचन

क्या बकरी क्या भेड है क्या आपन जाया ।
रक्तमासु सब एक है तुके किन फरमाया ॥
नानक घट परचै भई सबही घट पीरा ॥
सकलजत्तके आतमा महबूब कबीरा ॥

इति मयमांस अमल सर्वथा अभक्ष

अथ विचार जीवहितकारी वर्णन

कवित्त-बोलत विचार कर डोलत विचार कर सुक्तिद्वार
पालन विचार सरदार है । बैठत विचार कर उठत विचार कर
हाट बाट घाटहू विचार घरबार है ॥ योगहू समाधि माँह ज्ञानहू
अगाध माँह साथक अरु सिद्धको विचार सब सार है । रनवन
घन यज्ञदान सुमिरन महँ जहँ तहँ देखिये विचार जिव तार है ॥