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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2046

( १९६८ )

बोधसागर

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विधिहरि हर नितजाको ध्यावै । संतको भेद सोऊ नहि पावै ॥
सतसंगत सब सुखकी खानी । सर्वलाभ ताहीते जानी ॥
जो तप कीजै वर्ष हजारन । छनसतसंगत कष्ट नेवारन ॥
सत्यस्वरूपी ईश्वर कहिये । ताके भक्तन संगत गहिये ॥
तासु नाम सतसंग कहावै । सो संगतगहि जिव तरिजावै ॥
साधुनकी सेवा मन लावै । तब सतसंगतको नर पावै ॥
सतसंगत कह विविधि प्रकारा । तामें द्वैविधि मुख्य उचारा ॥
हरिभक्तन ढिग बैठन ढंगा । दुतिये वेद पाठ सतसंगा ॥
जोकर भगवतभक्तन सेवा । ताते मिलै परम गुरु देवा ॥
सदशास्त्रन पढ़ि तिनहि बिचारे । कंठ पाठ सुख तिनको धारे ॥
तेहि अनुसार कर्म सब करई । सार असार तहां निरुबरई ॥
सोई शास्त्र है जिव सुखदाई । जाते भक्ती सुक्ती पाई ॥
जाहि शास्त्रपढ़ितन मन भटके । ताको ले पानीमें पटकै ॥
जैसे साधन अरु सतसंगा । वर्णन वेदकीन बहु ढंगा ॥
हरिभक्तनकी सङ्गत जोई । तेहि समान कहु तुलै न कोई ॥
सतसङ्गत जो टूटन चहई । सबही ठौर ताहिको लहई ॥
अपने पापको कारण आही । सतसङ्गत जेहि दरसे नाहीं ॥
अपनी दृष्टि दोष जो धारे । तेहि कारण परदोष निहारे ॥
निजु दग दोष चंद द्वै दरसै । अंधेको अन्धेर सब सरसै ॥
भक्तीमें दृढ हो न जबलों । सतसंगत करते रह तबलों ॥
मनक्रम साधुकि सेवा गहिये । गाहीते सबही सुख लहिये ॥
साहिब सदा सन्तके साथ । विन सतसङ्ग न आवे हाथा ॥
सन्तजान साहिबकी देही । भक्तन सङ्ग पाइये तेही ॥
भक्तन सुख हरि भोजन करही । सदा सो तिनके सङ्ग विचरही ॥
वरन विवेक एक नहि करिये । साधु जानि सेवा चित धरिहे ॥