कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९६५ )
कायर क्रूरकी शरणमें लागे । अंतमें छोड़िके ताको भागे ॥
श्वान पूछि गहि जाय न पारा । बूड़ि मरे भवसागर धारा ॥
अंधको राह देखाव कि अंधा । बंधेको खोले कह बंधा ॥
केत उपासक भाषे सोई । भक्ती अरु शरणागत दोई ॥
उभय भांतिसे प्रभुपद पाये । तामें ऐसो भेद बताये ॥
भक्ती ग्राहक ऐसे कहई । युक्ति जतन करि हरिपद गहई ॥
एकजन्म नहिं जन्म अनेका । छूटें नहीं भक्तिको टेका ॥
काहू जन्म मिले हरि अपना । छूटै सकलभय भर्म कलपना ॥
पुनि कह शरनागत जो ग्राही । करनकरावन मोहि कछु नाहीं ॥
शरन हो आपको हरि अर्पनकर । बहुरि नहीं कछु युक्ति यतनकर ॥
शरण हो फेर यतन जौं गहिये । तो शरणागत मिथ्या कहिये ॥
शरन हैं जौं निश्चयमें घाटा । ताकी यमगन रोकै बाटा ॥
जो सतगुरुकी शरणको ताकी । तेहि कछु यतन रहै नहिं बाकी ॥
ताते शरणागत सब परहै । शरण गहै ते जीव उबरहै ॥
शरणागत कह सब गुण आवै । ज्ञानभक्ति तेहिमाह समावै ॥
शरण हो जब यह निश्चय आई । प्रभु मोहि दोनों लोक सहाई ॥
सकल पाप ताको जरि जावै । जो सतगुरुकी शरणमें आवै ॥
शरणागतहो षट्गुन गहिये । ऐमे ताको व्यौरा कहिये ॥
विधि निषेध निजगुरुकी टेवा । दुतिये साधु प्रीत अरु सेवा ॥
तृतिये यह निश्चय उरधारै । मो अधबिसरि नाथ मोहितारै ॥
चौथे यह निश्चय मन माहीं । प्रभु तजि मोर सहायक नाहीं ॥
कैसेहु दुःख सांकरे गूढा । प्रभुतजि और सहाय न दूढा ॥
पञ्चम सतगुरु मूर्तिको ध्याना । ताके सन्मुख बिनती ठाना ॥
प्रभु तजि मोर ठेकाना नाहीं । पावन पतित नाम प्रभु आहीं ॥
मो सम पतित न कतहु निहारा । प्रभु सम और न तारनहारस ॥