कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९५७ )
चौथ प्रथम भाव मर्यादिक । जैसे नारद अरु सनकादिक ॥
तिनमें द्वैको त्याग बखाना । भय अरु वैर न भक्ति प्रमाना ॥
पुनि दुतिये अविहित कहावै । प्रेम उमंग हृदयमें आवै ॥
आपसे आप प्रेम उमडाना । वेदशास्त्र विधि कहु नहिं जाना ॥
उठै उमंग प्रेमकी धारा । आपै भक्ति गहै हरि प्यारा ॥
सबसे श्रेष्ठ भक्ति है येही । मिले धाय निज परम सनेही ॥
याहूमें कहिये द्वै ढंगा । प्रथम प्रमान कीन ज्ञान अंगा ॥
ताके अंगा भक्ती कह सोई । ज्ञान उपाय मुक्तिकर जोई ॥
दुतिये सो मंत्र भाषिये ताही । याके आप ज्ञानमय आही ॥
भक्तिको भाग ज्ञान कहलावे । भक्तिमें सकल ज्ञानगुन पावै ॥
विहित अविहित कीन उचारा । बहुरि भक्ति कह तीन प्रकारा ॥
उत्तम मध्यम प्राकृत ताना । तिनको ऐसे अर्थ बखाना ॥
उत्तम भक्तीको यह लेखा । सर्व मई ईश्वरको देखा ॥
जल तरंग जस भेद न कोई । भक्ती श्रेष्ठ कहावै सोई ॥
शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । आपै आप रमै प्रभु सोई ॥
दुतिये मध्यम भक्ति बन्दता । भगवत भक्त और भगवन्ता ॥
दोनों ते सो प्रीति लगावै । दुरजन देखि न ताको भावै ॥
तृतिये प्रतिमा पूजा ठाना । मूरत को भगवत करिजाना ॥
भगवत भक्तनसे नहिं प्रीति । प्राकृत भक्त केर यह रीति ॥
बहुरि भक्ति कह तीन बिधाना । सात्त्विकराजसतामस जाना ॥
सात्त्विक भक्ति कहे निष्कामा । राजस होय कामना जामा ॥
तामस बैरी विजयके कारन । त्रिविधभक्ति पुनि कीन उचारन ॥
मानस बाचक कायक होई । बहुरि चार बिधि कहिये सोई ॥
प्रथम जोद्रोपदि आरतनिजहित । दुतिये जिह्वासू नृप प्रीछित ॥
तृतिये अर्था अर्था सोई । दुनिया चाहे ध्रुव जस होई ॥