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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९५२ )

बोधसागर

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जहाँ लगि तन पोषक नर नारी । सो नहिं करनीके अधिकारी ॥
सिन्धुमें जो कोई गोता मारा । सो नहिं राखै भय घरियारा ॥
जबलोंं सिंधु न डुबकी मारे । तबलोंं रत्न हाथ नहिं धारे ॥
शर शय्यापर भीष्म विराजे । करि षट्मास शयनगति साजे ॥
तन मन कसहि मुनीश्वर ज्ञानी । लहै भक्ति सब सुखकी खानी ॥

सत्यकबीर वचन-रेखता

हमनसे मतमिलो यारो हमन खफकी दिवाने हैं ।
खुशीकी राह छोड़ी हैं कठिनमें जा सामने हैं ।
हमन दिन रैन रोते हैं वो रामसे जान खोते हैं ।
सुली की सेज सोते हैं विरहके ये रकाने हैं ॥
हम न हथियार हैं जानी पिया हरिनामको पानी ।
आखिर सब होवैगे फानी बलीमें जा समाने हैं ॥
तजी खिदमत वजीरीकी लही लज्जत फकीरीकी ।
चढ़े किस्ती सबूरीकी फुकुरके रकाने हैं ।

चौपाई

पुरुषारथकी ऐसी बातें । कर अवश्य पुरुषारथ ताते ॥
यथा कृषान कृषानी करई । उपजैं अन्न पेट निज भरई ॥
हलवाही अवश्य तेहि करना । भली भांति निजखेत सँवरना ॥
बीज बोय रखवाली कीजै । पशु पंछी करिसो मति कीजै ॥
करि निज श्रम बिनवै प्रभुपाही । भरे खेत वर्षाकरि ताही ॥
जो ईश्वर वर्षा नहिं करई । वृथा कृषानी ताकी परई ॥
जो बरपैं बरवारी सुकाला । तो कृषान सो होय निहाला ॥
जो आलस करिके नर कोई । संशय पै हल जोतै नहिं सोई ॥
बीज न बोय न कर रखवारी । बपैं घन अरु भरे कियारी ॥
ताहि अन्न फल हाथ न आये । मूरख मिथ्या आस लगाये ॥