कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 2022, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १९४४ )
बोधसागर
३६
नवी मलेशस्थानको यक रह । प्रभुप्रति विनतीकरि ऐसे कह ॥
हे प्रभु मोहि तियरति बलथोरा । यह बरदेव होय सो जोरा ॥
तेहि नम वानी कीन पुकारा । रति कारन कर मांसु अहारा ॥
मांसु खान लागा तब सोई । जान्यो प्रभुकी आज्ञा होई ॥
जस मनोरथ तैसी प्रभु आज्ञा । सत्य कहो करिके परितिज्ञा ॥
जस वासना जीव उर खोले । ताको यतन अकाशते बोले ॥
तथा फिरिशते स्वपना सुथरे । तस कलाम अछाको उतरे ॥
मिश्रसे जबहि यहूदी चाले । जब उजाड़में आय निराले ॥
मांसु खान कह प्रभु प्रतिटेरी । दियौ लगाय बटेरकी ढेरी ॥
खातहि खात मृत्यु तेहि डाला । कर्मको फल पायौ ततकाला ॥
जिन जिन मांसु खानको रोये । बचन एक प्रान सब खोये ॥
बीस वर्षके ऊपर जोई । सब मरि गयौ बचा नहिं कोई ॥
ज्ञान बिनाको प्रभु पहिचाना । ताको धर्म न कोई जाना ॥
जैसो धर्म धरे जो कोई । तैसी गति निश्चय लह सोई ॥
कोई स्वर्ग नर्कको भोगा । कोई अधर मृत्यु पुर लोगा ॥
जीव वासना प्रेरि लेआवै । ताही गतिमति स्थित करावै ॥
तीनों पुर पसरा यमजाला । कोइ बचै जेहि राख दयाला ॥
सत्यकबीर बचन
तीनों लोकमें लागी आग । कहैं कबीर कहैं जैहो भाग ॥
चौपाई
उभयवासनां ते जिव अटका । छूटै न आवा गौन को खटका ॥
कालहि रचै कालही पोषे । कालहि सब रचनाको सोषे ॥
कालको कृत कालही खैहै । कोई विरला गुरुगमबचजैहै ॥
कुंडलिया
निर्वाकार आतम सदा, वंधाकर्मकी डोर ।
मरकट नटके हाथ जिमि, फिरताखोरिन खोर ॥