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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2018

( १९४० )

बोधसागर

३२

इंद्री निज निज कर्मही योगा । निजनिज भोग और नहिं भोगा ॥
सो इन्द्री जेहि ब्रह्म लखाही । कोई इन इन्द्रिनमें नाहीं ॥
जाते आत्मको पहिचाना । ताकी है कछु और ठेकाना ॥
मौन दशा ताते गह साधू । यह सब दीखै भर्म उपाधू ॥
विन जाने जो मौन गहाई । सो नहिं साधु मूर्ख कहलाई ॥
जो कछु कहो कहत नहिं बनई । जो चुप रहौ रहत नहिं बनई ॥
आपै आप खेल सब खेले । भर्म कूपमें मोहि कयों ठेले ॥
रसै बसै सब माह समावै । अर्श पै अपनौ तखत बतावै ॥
जो जाने सो कैसे कहई । नहिं जाने बहु बानी बहई ॥
सबही धर्म जक्तमें तेरो । कहो तो दोष देय सब मेरो ॥

सत्यकबीर वचन

काल दयाल हमै है भाई । छोड़ो दुबिधा काल पराई ॥
सबही धर्म ताहि सतगुरुके । चीन्हे बिनाकाल नहिं सुरके ॥
स्वसंवेदमें कहा बखानी । ताहि बूझि सुख पावै ज्ञानी ॥
काल पुरुष सतपुरुष समायौ । सत्य पुरुषकी देह जो पायौ ॥
सत्यपुरुष दीनों निज देही । कालपुरुष गहि लीनो येही ॥
विषयभोग सब कालकी अंगा । देखहु स्वसंवेद परसंगा ॥
विषयवासना जिहि जिवजागी । सबको धर्मराय है भागी ॥
निविकार अरु विनय विहीना । सकल वासना त्याग जोकीना ॥
सो समस्त सतपुरुष सनेही । सत्यपुरुष पुर पहुँचे येही ॥
इन्द्रीभोग विषय जो ध्यावै । धर्मरायके धाम समावै ॥
सदा रहै सो कालके फंदा । सो नहिं सत्यपुरुषको बंदा ॥
रस प्रीतिसे भक्ति जो करही । विषयविहायनाम निति रहही ॥
कालहिमें दयाल प्रकटाई । गहि करतासु लोक ले जाई ॥
सत्य पुरुषको भक्त कहावै । विषय विकार तेजो मनलावै ॥