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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 20

( १० )

ज्ञानसागर

चौपाई

पुरुष आज्ञा अस भयउ अपारा । मारहु धर्म के मांझ कपारा ॥
आज्ञा पुरुष ज्ञानीदियो जबही । मारौ शीश परो खस तबही ॥
संशय भयो तासु की देहा । ताकहैं भयो जी महाँ संदेहा ॥
धर्म धीर कौ रुधिरसे जबही । विषम सरोवर उपजौ तबही ॥
कन्या निकस जो बाहिर आई । संशय काल तिहि घटहि समाई ॥
शीश दियो लै कुर्म के पास । पुरुष आज्ञा सौ कीन्ह निवासा ॥
आज्ञा कीन्हही बेग निकारहु । कहै जोइ अब धर्म सिधारहु ॥
छाड़हु अंश खंड का गाऊ । विषम सरोवर माहि सा जाऊ ॥
देखो बहुत रूप उजियारा । अस कामिनि तैं कीन्ह अहारा ॥
फिर मैं गयो पुरुष के पास । धर्म धीर अस करहि तमाशा ॥
कह कामिनि सुन पुरुष पुराना । मैं अपना कछु मरम न जाना ॥
कौन पुरुष मोही उपजाई । सो मोहि गम्य कहौ समुझाई ॥

धर्मराय वचन

कन्या मैं उपजायो तोही । रहौ अलख नहि भेंटसि मोही ॥
कन्या कह सुन पिता हमारा । खोजो वर होय व्याह हमारा ॥
वर खोजौ जो दुतिया होई । कन्या मैं अब व्याहौ तोही ॥
पुत्री पिता न होवत व्याहा । पितहि पाय बहुतै औगाहा ॥
साखी-धर्म कहै सुन कन्या, भर्म भयो मति तोहि ॥
पाप पुण्य हमरे घरे, क्या डहकस तैं मोहि ॥

चौपाई

आदि भवानी और धर्मराऊ । इन सब कीन्ह सृष्टि निर्माऊ ॥
पांच तत्त्व तीन गुण रहेऊ । बीज सहित अष्टांगी दण्ड ॥
चौरासीलक्ष जीवदियो सम्हारी । रचहु सृष्टि अब आदि कुवारी ॥
सेवा करहु सृष्टिकी ओरा । अलख निरंजन नाम है मोरा ॥