कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
१२
जाको किन्न अघट्ट रह, तीन काल युग चार ।
ताहीको सब ठट्ट है, हट्ट लगी पन सार ॥
जिन जिन शीश उठायऊ, टूटचो सबको किन्न ।
सत्यकबीरको किन्न जो, सदा एक रस तिन्न ॥
श्रीमुख सत्यकबीर कह, किन्न जाहिमें दीप ।
मोड़ा तेहि छोड़ो नहीं, तोड़ो ताको शीश ॥
किन्न सहित जब जोय नर, होय नहीं तब खैर ।
परे किन्न या संगमें, याहि ढंगते बैर ॥
वैर किन्नियासे भयौ, गयौ नरक जिव सोय ।
कुशल कौनि विधि तासुकी, रिपु जाको हरि होय ॥
जासु किन्निया नाम है, किन्न ताहिको सोह ।
और किन्न जो कोइ गहे, ले कबीर सँगलोह ॥
धनवितकों यह अंत है, सत विचारो जाहि ।
सो धन पर हंकारकर, अहं दुःखद सब आहि ॥
जैसे गृहीकी कथा, कहति निककीरकी आहि ।
जब फकीर गुनज्ञान गह, तब हकीर कह ताहि ॥
घर घर मांगत भीख जो, दरदर होत हकीर ।
कोई गालीदे मार कोई, तनक न तन मन पीर ॥
अथ हकीरको तुच्छ है, कुछ रहौ नहीं मान ।
अधिकते अधिक हकीर भो, तब साहिब पहिचान ॥
तब साहिब पहिनेऊ, फना कियौ तब आप ।
गना आपके कुछ नहीं, तन मन धन लखि पाप ॥
अंत हकारत जब भयौ, तूही तू तब टेर ।
जहँ तहँ देखो तूहि तू, मैं नाहीं कहु हेर ॥
मैं नाहीं जब ही रहौ, कहौ तूहि तू सर्व ।