कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1943, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें८१
कबीर चरित्रबोध
( १८६५ )
धरमदासका सब पसारा हुआ । जहाँमें जहाँतक हजार हुआ ॥
न अबतक वह जाहिर गुरु तीन हैं। कि सतगुरुके फरमान आधीन हैं॥
गुरु चार दुनियाँमें जब आयेंगे । नहजदे करी दौर दिखलियेंगे ॥
तो सारीजमीमें हो यह गुलगुलः। है सतनामसतऔर सब बुलबुलः॥
सिलहशोरतीनों कभी गाहमें । है पोशीदः सतगुरु हुकुम चाहमें ॥
निकल जब पड़ीं फौजसालार तीन । हो सुक्तिसे मामूर सारीजमीन ॥
बमै वंश चारों हुकुम पायेंगे । शपातीं किधरके किधर जायेंगे ॥
पड़े शोरआलममें सत् नामका । हो शोदरः निजाते सरअज्जामका ॥
बहर सिम्र डंका है साहब कबीर । फिरें बोलते सत्यनाम सफ़ीर ॥
गुरु चार सतनाम डंका दिया । पुरुषकालके दिलमें सनका दिया ॥
बहरसू जुझाऊ बजे डट्टठोल । कि सबकैदियोंकीही जंजीर खोल ॥
बजै झांझ औ शंख मिरदंग जो । जिसे देखते दूत दल दंग हो ॥
न वे जूर पुर नूर है सब समात । तुलू महहै कटगई सारी रात ॥
गुरु चार हरजाय बोले नकीब । न बाकी रहा और कोई है कीब ॥
करे गुफतगू उनसे जो दूबदू । मती सारे उनके न कोई अदू ॥
धर्मदास साहबके बयालीस वंशकी प्रशंसा ।
उर्दू शेर
धरमदासके जो बयालीस वंश । सो सब सत्य सुकृतिके रूपहंस ॥
जुदागानः तारीफ़ उनकी लिखैँ । कदमदतकेपर अपने शिरकोरखैँ ॥
है औवल मचन वंशचौरामनी । गुरु सत्यमारग धरमके धनी ॥
कि इनसांका जिसमें गुजारः हुवा । परमपुर्ष यह पर नजारः हुवा ॥
वचन जो सतगुरुका अवतार है । उसीके महर्जीव भवपार है ॥
सुदर्शन साहब दूसरे नाम जो । करे जीव भवपार कण्डहारसो ॥
जोकुलपतिसाहबतीसरेनामदार । पनह जिसके सबजीवहों कामगार ॥
जोपरमोदगुरुचैथेबाला हैं पीर । सोशाफीबनाजीजेखतर खतीर ॥
नं. ११ बोधसागर - १