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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1926

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बोधसागर

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छुटकारा मान रही है। इनकी बुद्धि तथा इनका चित्त ठिकाने नहीं है। इनकी बुद्धि तथा पाशविक बुद्धिमें मनुष्यताका लेश-मात्र नहीं है।

चार वेद तथा चार पुस्तकें ये आठों काल पुरुषके जाल हैं। इस जालमें फँसाकर उसने समस्त मनुष्योंको मार लिया और मनुष्योंको उसने ऐसा धोखा दिया कि, जितने नाम सत्य पुरुषके थे वे सब अपने नाम प्रकट किये। और सत्य पुरुषके धोखेमें समस्त मनुष्य कालपुरुषकी बंदनामें लगे और काल-पुरुषने सत्यपुरुषका नाम छिपाया और यह भेद ब्रह्मा विष्णु और शिवसे भी नहीं कहा इस धोखेसे समस्त मनुष्य इस शिकारीके शिकार हो गये। जो कोई चार वेद तथा चार पुस्तकों से पृथक् होगा उसको सूक्ष्म वेदकी ज्ञान प्राप्ति होगी। जिनका प्रेम पुरुषम वेदसे है वे स्वसम्वेदसे कैसे प्रेम कर सकते हैं।

विष्णुको तीनों लोकोंकी सरदारी तथा अधिकार मिला है उसीके अधीन सब हैं। निर्गुण निरञ्जन और सगुण विष्णु यही समस्त लोकोंके रचयिता तथा कर्ता धर्ता हैं, तीनों लोकोंमें विष्णु सम्यक् रूपसे उपस्थित रहते हैं। दोनों रूपसे निरंजन तीनों लोककी ठकुराई करता है।

तीनों लोक भवसागरका ठीकादार निरंजन है। और सत्रह असंख्य चौकड़ी युगका उसका ठीका है इतने समयपर्यन्त तो बिना पारख गुरुके कोई मुक्ति नहीं पावेगा। जब ठीकाकी यह सीमा बीत जायगी तब अक्षर पुरुषके राज्यका समय आवेगा। इस राज्यमें समस्त जीवोंके छुटकाराकी आशा होगी।

प्रथम स्वसम्वेद ब्रह्मसृष्टिमें था। जब कालपुरुषने भरमाया सृष्टिकी रचना की तब उसमेंकी निकृष्ट बातोंको निकालकर