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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1883

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कबीर चरित्रबोध

( १८०५ )

गरीबदास निर्भर कहैं, जो कोई नाम जपन्त ॥
मैं बालक मैं बृद्ध हूँ, मैही जवों जमान ।
गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमही चारों खान ॥
गगन शून्य गुसा रहूँ, हम परकट परवाह ।
गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥
आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप ।
गरीबदास जलतरैंग ज्यों, हमहिं सागरसीप ॥
गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल ।
गरीबदास टूँढत फिरैं, हीरे माणिक लाल ॥
इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाउँ ।
गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥
बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल ।
गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥
सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान ।
गरीबदास शिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥
स्वामी घुंडी खोलके, फिर माला गले डार ।
गरीबदास इस भजनको, जानत हैं करतार ॥
डचोढ़ी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय ।
गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परवेश ।
गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥
यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर ।
गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥
हे स्वामी तुम स्वर्गकी, छोड़ो आशा रीत ।
गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥