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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1860

( ५४ )

बोधसागर

गुरुकी महिमा संक्षेप भनी । गुरुकी महिमा अनंत घनी ॥
औतार धरी हरि गुरु करे । गुरु किये तब नारद तरे ॥
साख पुरातम ऐसी सुनी । बात हमारी गुरु चरणों बनी ॥
कीड़ी जैसा मैं हों दासा । पडा रहा गुरु चरणों पास ॥
गुरु चरणों राखों विश्वास । गुरुहि पुरावे मनकी आसा ॥
सारखी-गुरु गोविन्द अरु शिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक ॥

तिरबेनी धारा बही, आगै गङ्गा एक ॥

गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय ।

तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहों समाय ॥

इति श्रीद्वितीय खण्ड गुरु महिमा समाप्त

अथ गुरुमहिमा प्रारंभः

तृतीयखण्ड

गुरु सतपद भजु अमृतबानी । गुरु बिनु नहीं रे प्राणी ॥
गुरु हैं आदि अन्तके दाता । गुरु हैं मुक्ति पदके दाता ॥
गुरु गङ्गा काशिहि स्थाना । चारवेद गुरुगमसे जाना ॥
अरसठ तीरथ भ्रमि २ आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥
गुरुको तजै भजै जो आना । ता पशु याको फोकट ज्ञाना ॥
गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कश्चन होई ॥
शुक्र गुरु किये जनकरुवैदेही । वो भै गुरुके परम सनेही ॥
नारद गुरु प्रहलाद पढाये । भक्तिहेतु जिन दर्शन पाये ॥
काकभुशुंडि शंभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सब कहि दीन्हा ॥
ब्रह्मा गुरु अग्निको कियेऊ । होम यज्ञ जिन यज्ञ दियेऊ ॥
वशिष्ठ मुनिगुरुकियेरघुनाथा । पाये दर्शन भये सनाथा ॥
कृष्ण गये दुर्वासा शरणा । पाये भक्ति जब तारन तरना ॥