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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1855

सुभिरनबोध

( ४९ )

गुरुसेवा माहात्म्य

गंगा यमुना बद्दीश समेते । जगन्नाथादि धाम हैं तेते ॥
सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरुसेवामें पावै फल तेतो ॥
गुरु महात्म को वार न पारा । वरणेशिवसनकादिक अवतारा ॥
गुरु महिमा मोपै वरणि न जाई । महिमा अनन्तममम तिलघुताई ॥

गुरु भावना

गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहि आने ॥
काम क्रोध रहितगुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥
काम क्रोध लोभ समाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥
यही दृष्टिसे गुरुको सबै । तबतन मन धन गुरु सबको देवै ॥
तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सो शिष लहै मुक्तिको मेवा ॥
बचन उचारे पुढुम सम वाणी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥
ऊँच नीच सबही सुन लीजै । कबीर बचन प्रमाण करीजै ॥
मेरे और कछु नहि चहिये । गुरु भावना गुरुहिय लहिये ॥

दोहा—सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मण्ड ।

सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बढ़ो परचंड ॥

यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव विन भव जल बहिये ॥
जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥
वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मौ चौरासि न जावै ॥
अष्ट अङ्गसों दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकासा ॥
गुरुको शिष ऐसे नहि मानै । सो त्रयताप जरत चारो खानै ॥
योगी यती तपी आशरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥

गुरुचरणोदक माहात्म्य

कोटिक तीरथ सब करआवै । गुरु चरणा फल तुरतहि पावै ॥
कदाचित् चरणा मृत पावै । चौरासी गत सतलोक सिधावै ॥