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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1852

( ४६ )

बोधसागर

एकबार गुरु महिमा पठयी । सोफल सबही क्षणमें लहयी ॥
काशी क्षेत्र बहुबिधि दाने । गया प्रयाग पुष्कर असनाने ॥
सो फल सबही यामधि पावे । श्रद्धासहित जो पाठ करावे ॥
निर्मल होय पाठ जो करई । सो नर सहजे भवनिधि तरई ॥
वेद पुराण अरु शास्त्र विलोई । जाह्निकस्योगुरुमहिमासोई ॥
गुरु महिमा सारको सारी । गिरिजाप्रति भाष्योत्रिपुरारी ॥
गुरु महिमा गुरुगमसे गाया । चढि सत पारख नादबजाया ॥
सत्तकबीर जब दाय़ा कीनी । गुरुमहिमा तब वर्णन कीनी ॥
साखी-गुरुमहिमा गुरु गम अहै, जाने सन्त सुजान ।

पढे विचारे मन करे, पावै मोक्ष निदान ॥

गुरुमहिमा शतक यहि नामा । पाठ किये पूरे सब कामा ॥
सो चौपाई यामहि आही । बीस दोहरा साख सदाई ॥
दो चौपाई दुइ सो साखी । फल वर्णन महाँ पुनि राखी ॥
पांच चौपाई यक सो दोहा । संख्या तिथि वर्णनमहाँ जोहा ॥
या विधि पूर्ण भयोयहग्रन्था । जाते जिव पावे सत पंथा ॥
याको पाठ करे जो कोई । उभय आनन्दफल पावे सोई ॥
गुरुसंतन पाऊँतिन शिर नाऊँ । मातु पिताके बलिबलि जाऊँ ॥
सत्य कबीर सत्य गुरु राई । जिनकी कृपा परख पद पाई ॥
धर्मदास गुरु जग आये । करि उपदेश जगजीवचिताये ॥
राम रहस पूरण गुरु राई । सबको वन्दो शीश नवाई ॥

साखी-नभ रस निधि चन्द्र कह, पौष पूर्णिमा जान ।

बिक्रम सम्बत जानिये, रविवासर दिन मान ॥

इति श्रीगुरुमहिमा शतक समाप्त