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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1848

( ४२ )

बोधसागर

साखी-पंचकोशमत प्रकट जग, वेद कहे सत सोइ ।
परख बुद्धि निज दृष्टि बल, गुरु कृपा करे जब होइ ॥
द्वैताद्वैत का करे विचारा । शुद्धाद्वैतका करे उपचारा ॥
विशिष्टाद्वैत भली बिधि जाने । पूछत पूछत सबै मन मानै ॥
कर्मोपासना करै विचारा । ज्ञान विज्ञानका पावे सारा ॥
अर्थ धर्म मोक्ष रू कामा । सबका पूछे असली धामा ॥
नवधा भक्तिको रूप पिछाने । योगक्रियाको भली बिधि जाने ॥
राजयोग हठयोग स्वरूपा । सबही आसन सिद्धि अनूपा ॥
ब्रह्म जीव अरु प्रकृतिका भेदा । द्वैतज्ञानका करे अच्छेदा ॥
नाना मत जग आहि जो भाई । सबका भेद जो गुरुसे पाई ॥
आस्तिकनास्तिक मन अनुहारा । सबही फंदा करे विचारा ॥
पूछि गुरुसे सबही सुधारै । गुरुके पारख काल फन्द टारै ॥

साखी-संसाररी पारख बिना, कैसे पावे ठौर ।
विध युक्ति अनमिल सबै, भोग वहीँ औरके और ॥
कालजालकी विकट है चाला । जीव विकल तेहिमध्ये विहाला ॥
पारख यथारथ प्रभु प्रकाशू । कठिन महात्म काल विनाशू ॥
काल चक्र चक्की कठिनाई । पारख पाये जात बिलाई ॥
पारख बल बहियाँ भौजेही । सबहीविधि चीन्ह पडाखलतेही ॥
गुरु प्रसाद पारख हठ पाये । विकट कला यम जालछुडाये ॥
एक एक पारखे जेहि फाँसा । सो संक्षेप करे प्रकाशा ॥
जाते जीव बचे यमफाँसा । शरणागत हठ परख विलासा ॥
भक्तिभाव प्रेमहि अधिकाई । परख लहत बल काल नशाई ॥
कालकला नहि पावे ताको । भक्ति भाव गुरु पारख जाको ॥
परम पारखी जीवन मुकता । नहि पावे तेही कालक उकता ॥
साखी-बिनु शरणागति परख गुरु, नहि जीवन निस्तार ।
सरवोपरि गुरु परख हैं, लहै तो होय उबार ॥