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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1814

( ८ )

बोधसागर

सुमिरन घर बुहारनेका

सुमति बुहारी कर गहि लीना । कचरा कुमति दूर कर दीना ॥
बावन लाख दगा मिटि जाई । साहबकबीरकी फिरी दुहाई ॥

सुमिरन घर पोतनेका

हरियर गोबर निर्मल पानी । चौका पोते सुकृत ज्ञानी ॥
सवा लाख चूक बकसाये । चौका पोत जेवनार चढाये ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । हंसा पहुँचे पुरुषके पास ॥

सुमिरन चूल्हामें अग्नि बारनेका

चूल्हा हमारे चौहटे, सब घर तपे रसोइ ।
सत सुकृत भोजन करे, हमको छूत न होइ ॥

सुमिरन रसोई बनानेका

सुत सुकृत कीन्हा जेवनारा । ताते करत न लागे बारा ॥
सतघरी दो पहरि यां सांझा । लक्ष्मी बैठी रसोई मांझा ॥
सत् पकवान लक्ष्मी करे । तीनलोकका उदर भरे ॥
कहैं कबीर लक्ष्मी समुझाय । संत सुहेला बैठे आय ॥

सुमिरन थारी परोसनेका

चन्दन चौका कंचन थारी । हीरालाल पडुमकी झारी ॥
बहुत भांति जेवनार बनाये । प्रेमप्रीति सो पारस कराये ॥
संत सुहैला भोजन पाई । सत्सुकृत सतनाम गुसाई ॥

सुमिरन प्रसाद अर्पणेका

संत समाज धरती स्थूला । प्रसाद चढावें धर्म निर्मूला ॥
ओढे साल क्षमाके दीन्हा । सोई शब्द जो पावै चीन्हा ॥
नीर निरंतर अन्तर नेह । शब्द अगाध जो लागे देह ॥
कहैं कबीर चितजित जनि डरो । नाम सुमिरि जल अर्पण करो ॥