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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 18

( ८ )

ज्ञानसागर

शीस तोरि लियो द्वीप अपारा । तबहि धर्म भयो बरियारा ॥
पांचौ तत्त्व अंडसौं लीन्हा । गुन तीनों सुशीस कर कीन्हा ॥
पांचौ तत्त्व तीन गुन सारा । यही धर्म सब कीन्ह पसारा ॥
तब कियो नीर निरंजन राया । मीन रूप तबही उपजाया ॥
करि चरित्र धर्म तब आया । आज सहजसों विनती लाया ॥
साखी-जाय कहौ तुम पुरुष सों, बहु सेवा मैं कीन्ह ।
सब सुत रहिहैं लोकमहैं, नव खँड हम कहैं दीन्ह ॥

चोपाई

इतने में नहि मोर रहाऊँ । जहँवा रहव देव मोहि ठाऊँ ॥
चले सहज पुरुष पर जबहीं । विनती धर्म कीन्ह पुनि तबहीं ॥
मांग्यो बीज कीन्ह बड़ लोभा । जातैं द्वीप पावों मैं शोभा ॥
सहज विनय पुरुष सों कीन्हा । हे स्वामि तुव सुन बल हीना ॥
मांगै और ठौर पुनि सोई । धर्म धीर जो तुव सुत बल होई ॥
अति अधीन मांगै जौ बीजे । सोहे द्वीप पुहुप वहि दीजे ॥
तबहि पुरुष सेवा वश भयऊ । अष्टांगी कामिनि सो दयऊ ॥
मान सरोवर ताकर नाऊँ । सोऊ दियो धर्म कहैं ठाऊँ ॥
अष्टांगी कन्या उत्पानी । जासौं कहिये आदि भवानी ॥
रूप अनूप शोभा अधिकार्ई । कन्या मान सरोवर आई ॥
साखी-चौरासी लक्ष जीव सब, मूल बीजके संग ।
ये सब मान सरोवरा, रच्यो धर्म बड रंग ॥

चोपाई

सहज संदेशो ल्याये जहँवा । धर्म धीर ठाढे हैं तहँवा ॥
कह्यो संदेश धर्म मन गाजा । मान सरोवर जाइ विराजा ॥
साखी-देखि रूप कामिनि कौ, पल भर रह्यो न जाइ ।
आगे पीछे ना सोचिया, ताकौ लीन्हेसि खाइ ॥