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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1789

आगमनिगमबोध

( ६७ )

अथ बारह पंथ वर्णन

दोहा—आइ कुनकाई प्रथम, तुसलाई कपिलान ।
तृतीये सप्तनाथ पंथ है, चौथ धर्म नाथ जान ।
वैराग्य नाथके भरथरी, षष्ठम गङ्गा नाथ ।
रामचन्द्र सप्तम कहै, अष्टम लक्ष्मण नाथ ।
फिर नटेश्वरी नवम है, पिंगल दशम कहाय ।
पुनि धजपंथ इग्यारहे, बारहे कानी फाय ।

इति

अथ अष्टांगयोगवर्णन

दोहा—जमनियमोआसनकहो, प्राणायाम अगाध ।
प्रत्याहारो ध्यान कह, पुनि धारण समाध ॥

अथ यमकी दश शाखा वर्णन

दोहा—युक्ति सहित सब कर्मकर, ताको यमबतलाय ।
जाते साधन सुगमहो, सकल कलुषता जाय ॥

चौपाई

प्रथम अहिंसा जीव बताई । नर पशु आदि एक समताई ॥
मनसा बाचा कर्म या तीनों । काहूको कछु दुःख नहिं दीनों ॥
द्वितीये बोले साची बानी । मिथ्यावाक्यते धर्मकी हानी ॥
तृतीये पर धनको मति हरना । चौथे परतिय संग न करना ॥
पञ्चम दायो हृदय महार् । दुखी दरिद्री करो सहाई ॥
छठये अर्चा ताहि बखानी । बुधिते धर्म कीजिये प्रानी ॥
अहंकार मद मान न धरिये । औरहि कबहु तुच्छ मति करिये ॥
सप्तम क्षमा ताहि को जाना । लाभालाभ न सुखदुख माना ॥
अष्टम धौत धर्म भल साजी । जो कछु लाभ ताहिमें राजी ॥
नवमें अल्प अहार करीजै । दशमें शोच भली विधि कीजै ॥

इति