कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआगमनिगमबोध
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सदा शौच असनान जो कीना । संध्या बदले आत्म लैलीना ॥
जब कबहूँ चित चंचल होई । पढ़ै उपनिषदको तब सोई ॥
औषद सम भोजनको भोगा । चाहे नहिं कछु सुख संयोगा ॥
शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । सदा सैन पृथ्वीपर सोई ॥
धरतीपर धरि भोजन करही । चार मास वर्षा न बिचरही ॥
फिरै अकेले संग न कोई । भिक्षा भोजन गहै न ओई ॥
सोलह त्रास अहार प्रमाना । लेय हाथपर भिक्षा दाना ॥
जाके घर भिक्षाको जाही । मुखसे तहैं कछु माँगै नाही ॥
जेती बारमें गऊ दुहाई । गृही द्वार तबलों ठहराई ॥
जहैं माँगन को कारण पावै । तहां प्रणवको शब्द उठावै ॥
तीन बार कर शब्द उठाना । जाते गृही सुनै निज काना ॥
तीन भौन कै पांच कि साता । येते घरलों भीखको जाता ॥
जौ भिक्षा संयोग न लहई । तौ संन्यासी भूखा रहई ॥
भिक्षा ले पुनि बनहि सिधारे । मता श्रेष्ठ संन्यास उचारे ॥
पहिले वेदपाठ करि लीजै । तब पीछे संन्यास कहीजै ॥
वेदकि विधिते बोध न जबलों । धर्म मर्म जाने कह तबलों ॥
ऐसी विधिते भोजन करही । मोट देहि जिहि नजर न परही ॥
सदा काल आतम लौलीना । सकल भर्म भयतजि तिनदीना ॥
प्रथमे सब सुख भोग भरीजै । सब इंद्रिनको तृप्त करीजै ॥
तब पीछे लीजै संन्यासा । रहै न काहू वस्तुकि आसा ॥
शीतकालको गुदरी एका । राखे सो निज सहित विवेका ॥
यह मध्यम संन्यास प्रमाना । अब उत्तमको करें बखाना ॥
नम्र दिगम्बर बाना होई । शीत उष्ण दुखसुखसह सोई ॥
सहदुख सुखदुखसुखनहिंमाना । ऐसे निज मनमें अनुमाना ॥
ज्ञान अग्निमें तन हम दाहा । अब याकी कछु रही न चाहा ॥