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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1780

( ५८ )

बोधसागर

तिहि औसर शिव परम सनेही । वेद धर्म थापै करि देही ॥
जैसो आगम व्यास बखाने । जैन बुद्ध मत महि अधिकाने ॥
वेद धर्म तब भयो मलीना । बिरला कोई आदर दीना ॥
बिकमादितके समयमें कहेऊ । शंकर शंकराचार्य भैऊ ॥
दक्षिण देश द्विजकुल औतारा । वेद धर्मको पालन हारा ॥
चहुँदिश जाय विजय दिग कीना । कथि निजज्ञान नीति जगलीना ॥
वेद धर्म मरयाद धराया । बाढ़ी सन्मुख तासु पराया ॥
स्मृती धर्म कीन परचारा । धर्म स्मार्त नामसो धारा ॥
जैन बोधको जीत्यौ सोई । राजा शंकरकी वश होई ॥
तिहि औसर भूपाल छुभाया । केते जैनी सरित डुबाया ॥
मंडन मिश्र ब्रह्मा औतारा । धर्म मिमांसा जग विस्तारा ॥
शंकर जब तापर जय पाई । ताकी नारि ताहि ससुहार्ई ॥
मंडन मिश्र गये जब हारी । कामशास्त्र कथ ताकी नारी ॥
शंकराचार्य बाल ब्रह्मचारी । काम शास्त्र विद्या नहि धारी ॥
तिहि औसर अस कारण भयऊ । नृप अमरूक देह तजि गैऊ ॥
योगके बलते शंकराचार्य । नृपतन प्रवेश कियौ निजुकार्य ॥
काम कला सीखे षट् मासा । नृपतनमें कर भोग विलासा ॥
काम शास्त्रको ग्रन्थ बनाई । सो अमरूकशतक कहलाई ॥
नृप तन तजि मंडन पहुँ आये । तासु नारि पर तब जय पाये ॥
मंडनमिश्र भे शंकर चेला । ताको धर्म गह्यौ तिहि बेला ॥

इति

अथ पूर्व आचार्यनके नाम-चौपाई

जहां तो आदि संप्रदा चाली । पीढी पीढी कथौ निराली ॥
प्रथम विष्णु दूजे शिव होई । पुनि तृतीय वसिष्ठ मुनि जोई ॥