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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1777

आगमनिगमबोध

( ५५ )

सात सिंधु तिहि काल छुभाही । जलकी वृद्धि एक है जाही ॥
पुष्कर मेघ कीन पुनि कोपा । जलसे सकल भूमिको तोपा ॥
मुसल धार पानी बरसाई । मोटा धार पुनि वृक्ष कि नाई ॥
बहुरि नदीकी धारा जैसे । नभसे पानी वरवै ऐसे ॥
ये तो जल दिशा उर्ध चढता । पहुँचे ब्रह्मलोक परजंता ॥
इन्द्र कुबेर आदिक दिगपाला । भोगिके ब्रह्म लोकको चाला ॥
यहि बिधि सकल जलामय होई । जीव जंतु कहुँ रहै न कोई ॥
पृथ्वी गलि जलमें मिलि जाई । तिहि औसर भैरों प्रकटाई ॥
पृथ्वीते आकाश लों देही । महा भयानक रुद्र है येही ॥
तिहु दृग मानहु सूर्य है तीनी । ऐसो तेज मयी कहि दीनी ॥
तिही भैरोंकी श्वासा चाले । पानीके ऊपर सो डाले ॥
पौन प्रचंड नासिका बाटा । ताते होय बारिको घाटा ॥
ताकी श्वासा जल जब सोखे । रहे रुद्र पुनि आपै चोखे ॥
दशहु दिशा शून्य है जाई । रविशशि अग्न्यादिक बिनशाई ॥
गुन अरु तत्त्व न कबहुँ प्रकाशा । सर्व शून्य वतैं चहुँ पासा ॥
भैरों तनते निजु तन धारी । प्रकटे महा भैरवी नारी ॥
महा भयावन मूरत जाकी । सप्त सिन्धुकर कंगन ताकी ॥
मानुष छाया देखो जैसे । भैरों तनते प्रकटै जैसे ॥
इन्द्र कुबेर वरुण यम काला । तिनके मुंडको पहिरे माला ॥
नृत्त करे सो तहैं तिहि बारा । अट्ट अट्ट करि शब्द उचारा ॥
भैरों और भैरवी दोई । नृत्त करे तब शून्यमें सोई ॥
बहुरि लय भैरवी है जाई । भैरोंके तन माह समाई ॥
अब कछु शेष रहा नहीं खेला । तब भैरों रहि गयो अकेला ॥
दोहा-धरतीसे आकाशलों, भैरोंकी जो देह ।
सर्व शून्य करि दशदिशा घटन लगी तब येह ॥