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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1749

आगमनिगमबोध

( २७ )

अधिक कृपा गुरु तापर कीनो । रामानन्दको यह वर दीनो ॥
आयू साठे सात सौ वर्षा । बकसिदीन गुरुको हिय हर्षा ॥
गुरु सेवा चिरकाल बिताये । पुनि रामानन्द काशी आये ॥
रामानुज की सम्प्रदा माही । अधिक अचार देखिये ताही ॥
कछुक खेदको कारण पाई । रामानन्द अचार भुलाई ॥
आचारिनमें जब पग दीने । पगसे तब तिहि बाहर कीने ॥
दोहा-बहुरि राघवानन्दजी; रामानन्दसे भाष ।

अब न्यारी निज सम्प्रदा, कीजै मन अभिलाष ॥
चौपाई

रामानन्द सम्प्रदा न्यारी । तादिनसे मैं अलग अचारी ॥
रामानन्दको घना पसारा । धर्म आपनो जग विस्तारा ॥
रामानंदके शिष्य घनरे । सिद्ध प्रसिद्ध भे जक्त बडेरे ॥
अनंता अरु सत्य कबीरा । सुरसरा सुखानन्द मतिधीरा ॥
भावानन्द पीपा रविदासा । धनाआदि गुनगन परकाशा ॥
केते सिद्ध साधु गुनधारी । रामानंद पसारा भारी ॥
बावन द्वारा जाको भाषा । रामानन्दको बहु शिष साषा ॥

इति

अथ श्रीसम्प्रदायको धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

अयोध्या धर्मशाला चित्रकूट सुखविलास गोदावरी प्रदक्षि-
णाक्षेत्र धनुषतीर्थ रामनाथ धाम अच्युतगोत्र शुक्लवर्ण सीता इष्ट
जानकी मन्त्र राम उपासना मंत्र राघवानंदमहाप्रसाद अनन्त
शाखा सामीप्य मुक्ति श्रीनंदर लक्ष्मी आचार्य विश्वामित्र ऋषि
योगवाशिष्ठ मुनि हनुमान देवता हनुमान मन्त्र राम गायत्री
ऋग्वेद हरिनाम अहार विष्वसेन पार्षद रामानुज वैष्णव ।

इति