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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1747

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( २५ )

अथ रामानुजजीकी कथा-चौपाई

होन लगी जब धर्मकी हानी । शेषते तब कह शारंग पानी ॥
धरणी जाय धरो औतारा । करो तहाँ श्रुति धर्म प्रचारा ॥
भगवतकी जब आज्ञा पाये । तब धरणी धर धरणी आये ॥
केशव यज्जवा विप्र कहाऊ । कान्तिमती माताको नाऊ ॥
ताके गृहमें सो तनधारी । धर्म धुरंधर परम अचारी ॥
आठ सौ वर्षके ऊपर होने । कांचिपुरीके उत्तर कोने ॥
देश उडीसे के दिश लच्छिन । भूत नगरी औतार धरे तिन ॥
जक्त माँह आचार चलाये । पुनि पुरुषोत्तम पुरमें आये ॥
तहाँ जाय निज मनहि विचारा । जगन्नाथमें चले अचारा ॥
जगन्नाथ नहि मान्यौ सोई । मेरे पुर आचार न होई ॥
तब हरि ऐसी कीन्ह उपाई । रामानुज कह लियौ उठाई ॥
निज पुरते रात्रिके माही । धर दियो रंग पुरीमें ताही ॥
रामानुज को निजु अस्थाना । तोतादरी दक्षिणमें जाना ॥
एकसौ बीस वर्षलों जीये । गुरु पीढी इमि वर्णन कीये ॥

इति

अथ रामानुजजीकी गुरुपीढी वर्णन

दोहा-प्रथमें नारायण कहो, द्वितिये लक्ष्मी जान ।
विश्वसेन तृतीय कहो, पुनिसठकोप बखान ॥
पञ्चम श्रीनाथो कहो, पुंडरीकाक्ष है षष्ठ ।
राममिश्र सतयें कहे, यमुना चारय अष्ट ॥
नौमें पूर्णाचार्य है, रामानुज है तासु ।
ग्यारहें देवाचार्य है, हरियानन्द है जासु ॥
तासु राघवानन्दजी, ताके रामानन्द ।
पन्द्रहें रामानन्दके, शिष्य अनन्तानन्द ॥