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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1745

आगमनिगमबोध

( २३ )

किर्णमार्ग औषधहि समाही । किते पुष्प फलमें भरजाही ॥
तनधारी तिहि भोजन करही । जड आतमके वीर्यमें भरही ॥
सो सुखोसि में वेष्टित सारे । पिंजर गर्भमें सोई सिधारे ॥
दूध यथा है घृतमें पुरा । तिमि वीरजमें सब जिव जुरा ॥
वीरज दूरबीन ते देखो । चलतहिलतजिवअनितनिरिखो ॥

इति

अथ शरीरवृक्षवर्णन-चौपाई

एक प्रणवते सब संसारा । सबको आदि सर्व करतारा ॥
ब्रह्म सोई ओंकार कहीजै । मन ओंकार न भेद गहीजै ॥
ओंकार मन कर्म निरंजन । कर्म स्वरूप जबतको रंजन ॥
कर्मते फुटी तीन पुनि शाखा । रज सत तम जगकारन राखा ॥
कर्मते करत होय निहकर्मा । आगम ज्ञान गहि दूटे भर्मा ॥
तृष्णा ग्रन्थि कर्ममें परई । सोई जीवको बंधन करई ॥
आतम परमातम यह रूपा । विषयमें भूलि परा भ्रम कूपा ॥
विषय वा सना त्यागे जोई । ब्रह्म स्वरूप जानिये सोई ॥
आतम परमातमा विहंगा । दोनों एक स्वरूप यक ढंगा ॥
एक है पंछी एक है छाया । छाया नहीं आया लखिपाया ॥
मूल थूल जहैं तहैं प्रभु आपू । भ्रमकरि न्यारा न्यारा थापू ॥
पड़ा जीव यह त्रिगुनके फंदा । भूला रूप चिदानन्द कन्द ॥
काया वृक्ष ऊर्ध्व है मूला । हेठ शाख पत्री फल फूला ॥
मूल परम पुरुषको भेवा । पेड निरंजत शाख त्रिदेवा ॥
पाती जान सकल संसारा । सत्य कबीर वचन उचारा ॥

सत्य कबीर वचन-शब्द

सार शब्दसे बाचिहो मानो इतबारा हो ।
अक्षय पुरुष यक वृक्ष है नीरंजन डारा हो ॥

१. शरीर वृक्ष का चित्र देखो "कबीर मानु प्रकाश" में।