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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1743

आगमनिगमबोध

( २१ )

जीव आत्मा यह तिहि बेले । इन्द्रिको निजु संग सकेले ॥
सब इंद्री तजि निज खुटे । जाय जीव आतम ते जूटे ॥
उरमह दिसे बुद्धिके रूपा । मूर्ति एक तामें सब गुपा ॥
तनधारि तन आपुहि जाना । इन्द्रि सकल रहित भे ज्ञाना ॥
दृष्टि तब खनते हिलही । सूक्ष्म तन गति सूरजते मिलही ॥
सूर्यन पृथ्वी माह समाई । रसना स्वाद वरुणा में जाई ॥
वाक् अग्निमें पौन समीरा । दिशा सौन मन शशिके तीरा ॥
भूताकाश बुद्धिकर थाना । जिव सब संगले करे पयाना ॥
जो जिव भले कर्मको करता । दृगसार बाहर पग धरता ॥
सूर्य माह सब जाय समाई । इमि सब इंद्री राह गहाई ॥
भले कर्म जिनके अधिकार्ई । ब्रह्मरंध्र कटि बाहर आई ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसी राह गहै पुनि सोई ॥
जिवको बासा तनते छूटे । आवा गौन श्वासको टूटे ॥
जड समान देही रहि जाई । जीव नवीन कलेवर पाई ॥
अहं बोलिके जीव सिधारै । हौं मैं प्रथमहि शब्द उचारै ॥
सहित कर्म जिव करे पयाना । तजि तनथूलसौलिंग लहाना ॥
निज कर्मनके प्रेरित येही । सदा नवीन धरे जिव देही ॥
जिमियक भूषण भंजि सोनारा । निज इच्छाते और संबारा ॥
तैसे देह जीव यह गहई । पुनि पुनि गहै तजै श्रुतिगहई ॥
पूरन काल जीवको बाजा । उर्ध्व गमनको करै समाजा ॥
अधर लोक दोड लोकके बीचे । कर्म तहां जब जिवको खींचे ॥
ज्यों जाग्रत स्वप्नने भरमाई । अपने कर्मको फल इमि पाई ॥
सरगुन गहिकर सुरनमें बासा । असुरको गुनगहिदुःखबहुँपासा ॥
प्राण स्वप्नमें देखत सोई । जाग्रित माह बिचारे जोई ॥
ताहि समान गहैं सो देहा । दुख सुखको है कारण येहा ॥