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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1740

( १८ )

बोधसागर

हिरण्य गर्भं गुरु पंडित जासी । यज्ञ करंत चन्द्रपुर वासी ॥
जीव आतमाको गुण येही । जेहि औसर जैसी गह देही ॥
भ्रम भयते संयुक्त जो होई । भ्रमही रूप बनावै सोई ॥
ज्ञान बुद्धि जब होय संघट्टा । ज्ञान रूप हो भ्रम भय कट्टा ॥
पुण्य पाप कर्मनते जूटा । बँधा जीव ग्रह ताही खूटा ॥
तिहि अनुसार कर्म सब करई । जैसो कर्म धाम तस धरई ॥
जैसी देह कर्म कर तैसा । सदा आत्माको गुण ऐसा ॥
जीव वासनाते नित पूरन । जस वासना ताहिते जूरन ॥
मनमें यथा मनोरथ होई । अंतकाल फल पावै सोई ॥
रही लगी जह जीवकी आशा । सूक्ष्म तन धरि तहकरबासा ॥
पुत्र कामना जाको होई । पुत्र देह धरि प्रकटै सोई ॥
पुत्रको ऐसो उचित बतावै । पिताकि मन कामना पुरावै ॥
पिता मनोर्थ जो सुतन पुरावै । तौ पितु बहुरि देह धरि आवै ॥
पितु अपने मनोर्थ को हेरे । धरे देह निज इच्छा प्रेरे ॥
ज्ञान अरु परमारथ के कारण । जीव कीन मानुष वपु धारण ॥
अबलों कथा प्रसंग जो रहेऊ । बंधकामना व्यौरा कहेऊ ॥
वर्णन अब कीजे कछु तिनको । रहित कामना मन है जिनको ॥
सकल कामनाको जो त्यागे । कारण द्वै तिहि माह विभागे ॥
होय कामना जो कछु हीये । फेर न चाह भोगिभल लीये ॥
द्वितिये ज्ञानदृष्टि मनकामा । तुच्छ दृष्टि देवै सब तामा ॥
मिथ्या सकल जो कछु दरशाई । जानि अनित्य न नेह लगाई ॥
आतम ज्ञान सर्व पर जानी । ताते सर्व लाभको मानी ॥
आतमते सब कुछ प्रकटाना । ताहि लाभ सब लाभ लहाना ॥
सकल कामना जो कोइ त्यागे । आतम ज्ञान तासु उरजागे ॥
जो कछु चितमें चाह चपेरे । तौ बीन तन यह जिव हेरे ॥