कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४६ )
अनुरागसागर
चौरासी लाख योनिकी गिनती
नौ लख जलके जीव बखानी । चौदह लाख पक्षी परवानी ॥
किरम कोट सत्ताइस लाख । तीन लाख अस्थावर भाखा ॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना । मानुष देह परम पद जाना ॥
और योनि परिचय नहीं पावे । कर्म बंध भव भटका खावे ॥
मनुष्य खानि सवते अधिक क्यों है ? धर्मदासवचन
धर्मदास नायो पद शीशा । यह समुझाय कहो जगदीशा ॥
सकल योनि जिव एकसमाना । किमिकारण नहीं इसमझाना ॥
सो चरित्र मुनि कहौ बुझाई । जाते चित संशय मिटिजाई ॥
सद्गुरुवचन
सुनु धर्मनि निज अंश अभूषण । तोहि बुझाय कहौ यह दूषण ॥
चार खानि जिव एकै आहीं । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥
सो अब तुमसों कहों बखानी । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥
ऊष्मज दोय तत्त्व परमाना । अंडज तीन तत्त्व गुण जाना ॥
पिण्डज चार तत्त्व गुण कहिये । पांच तत्त्व मानुष तन लहिये ॥
तासों होय ज्ञान अधिकारी । नरकी देह भक्ति अनुसारी ॥
किन २ खानिमें कौन २ तत्त्व है । धर्मदासवचन कबीरप्रति
हे साहिब मुहि कहु समुझाई । कौन कौन तत्त्व इन सब पाई ॥
अंडज अरु पिंडजके संग । ऊष्मज और अस्थावर अंगा ॥
सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति छन्द
सतगुरु कहैं सुन दास, धर्मनि तत्त्व खानिनिवेरनो ॥
जाहि खानि जो तत्त्व दीन्हौ, कहौ तुमसो टेरनो ॥
१ इस पदको कई प्रतियोंमें लिखा है ।
सकल जिवन जिव एक समाना । नर सब औरनको नहीं जाना