कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1737, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंआगमनिगमबोध
( १५ )
अथ सप्त पातालके नाम
दोहा—अतल वितल सुतलोक ही, फेरि तलातल होय ।
महातला पाताल पुनि, अंत रसातल जोय ॥
इति सप्त पाताल
अथ नौघरोके नाम चौपाई
प्रथम भूमि भूलोक बखानी । दूजे भुवरलोक है पानी ॥
स्वर्गलोक पुनि अग्निको घेरा । पितर लोक पुनि वायू टेरा ॥
पंचम शून्य लोक आकाशा । अन्तर लोक हँकार प्रकाशा ॥
सप्तम सत्यलोक मह तचू । अष्टम लोका लोक कहचू ॥
ॐ शब्द तहवां ते होई । मायाको घेरा है सोई ॥
ताके परे नामै अस्थाना । शुद्ध स्वरूप निरंजन जाना ॥
शब्द निरञ्जन ते उत पानी । ताते तब माया प्रकटानी ॥
मायाते महतत्त्व पसारा । महा तत्त्व से भा हँकारा ॥
अहँकार आकाश उपायो । पुनि आकाश वायू प्रकटायो ॥
वायुते अग्नि अग्निते पानी । ताते यह भूलोक बखानी ॥
इति
अथ सप्तद्वीप और ब्रह्मांडको वर्णन
दोहा—प्रथमै जम्बूद्वीप कह, शाकद्वीप कर फेर ।
कौंच कुशा शलमरूप पुनि, पुक्षो पुष्कर टेर ॥
चौपाई
ताते परे योजन दश कोरी । कंचनकी पृथ्वी लै जोरी ॥
परम प्रकाश मान महि सोई । तासु परे परवत यक होई ॥
लोकालोक नाम सो भाषा । महाशून्य बन तापर राखा ॥
उग्र उद्दि यक ताते आगे । बहुरि अग्नि ताते पर लागे ॥