कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1725, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंआगनिगमबोध
( ३ )
पंच गौडको नाम बखानो । गौडकनौजियासारस्वतिमानो॥
उत्कल मैथिल पांचों गौडा । बहुरिबखानो पंच जो द्रविडा॥
द्राविड गुजराती अरु नागर । महाराष्ट्र तैलंग उजागर ॥
इनते बहुरि अनेकन भयऊ । न्यारे न्यारे नाम सो कहेऊ ॥
वैरागी दश ब्राह्मण जेई । वेदके धर्म ध्वजाधर येई ॥
क्षत्रीमें द्वै भाग प्रशंसी । एक सूर्य द्वितिये शशिवंशी ॥
वैश्यनमें बहु भांतिक भनिया । अग्रवाल आदिक बहु बनिया॥
शूद्र भेष भाषे विधि नाना । तिनको इहां न करौं बखाना ॥
ब्रह्मा चारों वरण बनाई । ताके मन पुनि चिंता आई ॥
बिन लेखक जगकाज न सरिहै । लेखक गणक कर्म को करिहै ॥
यहि विधि ब्रह्म जो करे विचारा । चित्रगुप्त प्रगटे तेहि वारा ॥
इति
अथ चित्रगुप्तजीकी उत्पत्ति कथा वर्णन—चौपाई
लीने कर लेखनि मसिदानी । प्रकटे चित्रगुप्त गुणखानी ॥
ब्रह्माकी अस्तुत उच्चारै । सोधुनिमुनि विधि पलकउधारै॥
ब्रह्माकी तब आज्ञा पाई । तपको चित्रगुप्त बन जाई ॥
वारह वर्ष कीन तप गाढे । पुनि भे ब्रह्मके सन्मुख ठाढे ॥
तब ब्रह्मा निज सभा लगाये । सुरनरमुनिभूपति चलिआये ॥
ऋषी सिसिरसा तहैं पशुधारा । निजकन्या वरहेतु विचारा ॥
कन्या चित्रगुप्त को न्याहा । महिपमन्वंतर पुनि अस चाहा ॥
भूप मन्वंतर सूरजको पोता । ताहि सभा तिहि औसर होता॥
सोऊ अपनी पुत्री देऊ । दोऊ तिय चित्रगुप्त वर गहेऊ॥
पुत्र यउपो दोनों नारी । एकते आठ एकते चारी ॥
माथुर गौड अरु कर्न भनीजै । बालमीक श्रीध्वजहि गनीजै ॥
सकसैना श्रीवास्तव ऐसे । श्रेष्ठाना श्रम सूक हैं तैसे ॥