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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1711

श्वसगुआर

( १०१ )

कपटकी भक्ति करहि विचारा । लाजधाज पाखंड पसारा ॥
ज्ञानदशा धरि पंथ चलैहै । ममता बाँधि जीव भरमैहै ॥
तहाँ आपु दृढ़ राखहु ज्ञाना । कालकिकला होय पिंसि माना ॥
बाहर काल चतुराइ भखीही । सदा अमान सुक्ति ते रखीही ॥
सत्य दुहाई फिरिहैं जहाँ । टिकै न कील कलाकी तहाँ ॥
जो जिव शब्द हमार न मानी । सो जाने वो है यमकी खानी ॥
आन मेटि दुविधा फैलइहै । सो जिव सपनेहु मोहि न पड़है ॥
शब्दकी शरण गहहि लौलाई । निर्मल हंस होइ सुखदाई ॥
काल कला धरि प्रकटहि आई । विरलै हंस रहै ठहराई ॥
काल कला मुख भापहि जबही । छुटिहैं चित्त हंसन कर तबही ॥
भापहि ज्ञानदृष्टि व्यवहारा । सुरति डोलाई करै अतिचारा ॥
कालपंथ महाँ प्रकटिहि आई । ज्ञानमेटि भापहि चतुराई ॥
शब्द वंशकी निंदा करि हैं । ममता बाँधि कालमुख परि हैं ॥
आप थापी वंश उठै हैं । शब्द मेटि जीवन भरमै हैं ॥
एक परिपच बाँधि हैं सोई । जो नहि हंस हमारी होई ॥
जब परिपच सुनाइहि काला । शब्दन सुमिरै तेहि करै बेहाला ॥
मन बच आश शब्दकी करि है । कालकी चाल चित्तना धरि है ॥
मन वच जानि शब्द कहैं धरि है । निश्चय सत्यलोक सो जैहै ॥
पाषण्डकी गति देहु बहाई । शब्दकी शरण गहै चितलाई ॥
शब्दकी आप शब्द लौ लाई । शब्द छोड़ि नहि आन चलाई ॥
शब्द पाइ करि है अभ्यासा । सुमिरन भजन शब्द विश्वासा ॥
अमर समाधि शब्द अवराधे । अक्षरमांह निरक्षर साधे ॥
पूरी तत्व लखै जो कोई । पूरण ज्ञानगम्य जेहि होई ॥
वंश सदाहि या तत्व समाई । बंद करै तो मोरि दुहाई ॥
बंश दयाते सब मिटि जाई । सुमिरि बंश बयालिस पाई ॥