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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1705

श्वासगुञ्जार

( १५ )

चारि कमलकी परिचय जानै । गहै भेद निज तत्त्व बखानै ॥
फाहा रोपि करै निरुबारा । आदि अन्त सब करै सुधारा ॥
योजन चार करै बन्धाना । आसन मारि रहै निर्वाना ॥
चारि योजन खूटी विस्तारा । रूई फाहा जो करै सुधारा ॥
सुधा रूई नर नाटक माहीं । खूँटी ऊपर रोपै छाहीं ॥
बैठे आसन भूल सुधारी । देखै परिचय श्वास विचारी ॥
चले श्वास रतना गति नेहा । रवि शशि उदय विचारे देहा ॥
फाहा सनमुख बैठि रहावै । निरखे ताहि तत्त्व जब धावै ॥
पांचौ फाहा रोपै जानी । तत्त्व सनेह करै विलछानी ॥
रविके घर होय श्वासा आवै । योजन एक तीन तहां धावै ॥
एक योजन एक एकै विचारा । प्रलय प्रचंड तेजकी धारा ॥
ताहि लगनकी गहै निशानी । कछु सुखउपजैकछु होयहानी ॥
मूलकमल ताकर रहि बासा । तेजपुंज है बुद्धि प्रकाशा ॥
ताहि कमलकी देखे आशा । मूलकमल तब होय प्रकाशा ॥
तासु लगन लै साजहु बीरा । उपजै बुद्धि ज्ञान गंभीरा ॥
ताहि लगनकी पांजी पावै । तेजपंज मह बहुरि न आवै ॥
दूजै योजन तजि प्रकाशा । ताहि तत्त्व की देखै आशा ॥
निर्वृत कमल महाँ ताकर बासा । काया मध्य सुभर रहि बासा ॥
योजन तीन जो है विस्तारा । पृथ्वी तत्त्व जानकी धारा ॥
ताहां बसै पवन बल वीरा । जाहि पवन संग उपजै छीरा ॥
ताके संघ सँवारहु वीरा । निर्मल हंस होय गंभीरा ॥
श्वासा साथ पारस सहिदानी । विन रसनाकी बोले बानी ॥
दुसरी घडी चन्द्र सनेहा । गहो विचार देखिकै देहा ॥
ताकी श्वासा चल चोचण्डा । कहे कबीर मिटै दुखदण्डा ॥
झीनी श्वास होइ गुञ्जारा । चले प्रचंड बासुकी धारा ॥