कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1698, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८८ )
बोधसागर
भूलै आदि तुरौ अस्थाना । ताते काल देहि बँधि खाना ॥
जौं वह तुरौ अन्त जीव पावै । खोलि कपाट बाहरको धावै ॥
आदि तुरौ चटि बाहर जाई । पाछै काल रहै खिसि आई ॥
आदि तुरौ विनु द्वार न पावै । बहुरि बहुरि चौरासी आवै ॥
धर्मदास बिनती अनुसारी । सतगुरु हो मैं तुम बलिहारी ॥
आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । पकर न पावै काल कसाई ॥
अन्त करै पुनि गर्भमें बासा । काया धरे करें रहि बासा ॥
कायाते जब बाहेर जाई । ताकर भेद कहो समुझाई ॥
मैं आधीन हा मतिके थोरा । चरण टेकि प्रभुकरौ निहोरा ॥
आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । सो सब जानौ चरण समाई ॥
वर्तमान भाषेहु उत्पानी । जानेहु आदि भेद सहिदानी ॥
अन्त अवस्था कहौ बखानी । जाते आगे होय न हानी ॥
जाहि द्वार प्रथमें चलि आवै । तुम प्रसाद शब्द लखि पावै ॥
कर्म अकर्म वरण कुल जाती । कहेउ बुझाय दिवस औराती ॥
कर्म अकर्म भाषहु बहु भावा । थमकर अन्त नजरि सब आवा ॥
कर्मरेख काल लखि राखा । गुरुप्रताप जानी सब शाखा ॥
गुणअवगुण सब कहि समुझायहु । गुरु शिष्यकर भाव बतायहु ॥
सो सब जानि गही सहिदानी । आदिभेद गुरु नाम निशानी ॥
नखशिख काल लिखा सहिदानी । सो सब जानिपरी मोहि बानी ॥
करम रेख काल लिखि दीन्हां । सो हम जानि दृष्टिमहँ लीन्हां ॥
गुण अवगुण दोऊकर भाऊ । परिखे काल करमकर भाऊ ॥
जहाँ २ काल लिखी सहिदानी । तू अदया है सब पहिचानी ॥
नखशिख रेखा काल बनावा । सो जो रेख जानि सब पावा ॥
आदि मध्य भाषहु सहिदानी । सो निशान जानी सब वानी ॥
जो भरि कहेउ सिखावन आनी । सो सब जानिकरौ दिलछानी ॥