कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशवासगुञ्जार
( ७५ )
समय-गुरुते माथेते उत्तरे, शब्द वेहुना होय ।
ताको काल घसीट है, राखि सकै न कोय ॥
चौपाई
गुरु भृङ्गी कर एक सुभाऊ । मेटे करम करे सुकताऊ ॥
शीख जोमन बसिदुबिधा करई । गुरु पुरा होई चित ना घरई ॥
चित तो धरे शीख विगारे । आपु सहित भवसागर डारे ॥
दीन दयाल गुरुनकी रीति । जैसे चन्द चकोरहि प्रीति ॥
सीखे सिखापन बहुविधि देही । भरम मेटि निर्मल करि लेई ॥
शीख भेद जो पूछे आई । क्रूर होइ तो उठै रिसाई ॥
पूर होइ तो शीखहि बोधे । कलह कलपना तजिकै सोधे ॥
शीश अज्ञान पार नहि पाई । ताते करै कपट चतुराई ॥
करै कुटिलता बोलै जोरा । गुरु पूरा होइ करै निहोरा ॥
समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ शीतल कहूँ तेजस डोलै ॥
समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ तेजस कहूँ शीतल डोलै ॥
जब जब शिष्य करै अज्ञानी । हृदय शुद्ध मुख कहै कुबानी ॥
भाव विचारि शिष्य सों कहहीं । शिष्य की दशा जोनीके लहहीं ॥
जोर कहनको शिष्य डराई । गुरुशब्द महँ लेइ मेराई ॥
गुरु पूरा होय ताहि सुधारे । करम काटि भव सागर तारे ॥
गुरु सुवास सबके सुखदाई । गुरु राखै तो काल न खाई ॥
जानेहु ताहि काल अभिमानी । काल अङ्ग धरि प्रकटे आनी ॥
गुरु नाता धरि शिष्य नशाई । रहनि गहनि नहि एक लखाई ॥
अज्ञान दिसासे शिष्य कहावै । गुरु होय गुरुगम समुझावै ॥
शिष्य करै बहु चञ्चलताई । गुरु पुरा होय लेइ बचाई ॥
गुरुकी दशा ज्ञानकी भाऊ । अज्ञान दशाते शिष्य कहाऊ ॥
रण ज्ञान गमी जेहि होई । हंस उवारन सत गुरु सोई ॥