सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1676, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1676

( ६६ )

बोधसागर

बोले मधुर शीलकी बानी । तेहि तन होय ज्ञानकी खानी ॥
पहिने ग्रीव समा जौ होई । शब्द विवेकी जाने सोई ॥
खंभज होय जाहि कर माहा । यश विस्तार ज्ञान अवगाहा ॥
पलक पसार छत्र जो होई । लोक निशानि अंश जनु खोई ॥
नासिका नेह होय जो मासा । कुटिल कठोर रोग तन वासा ॥
बौरनीपर जो गुजौ गुजा । तामस तेज विषयको पूजा ॥
कोतह गरदनी एचातानी । कुबजा गाडर विषकी खानी ॥
सुख चतुराई हृदय कठोरा । बोले झीन कोध कर जोरा ॥
इन जीवन जनि बोधहु जानी । अन्तकाल पुनि होवै हानी ॥
नारी नेह विचारहु जानी । देखहु देह द्वीप सहि दानी ॥
राज गुञ्ज निरखेहु अनुहारी । कर पगशीस लक्षहि विचारी ॥
चंचल चाल पोल होय पाऊ । तेहि जनि कबहु चरण छुआऊ ॥
गुञ्ज होय जेहि मास लिलारा । तेहि बोधते होई कर्म अपारा ॥
वोठ भुजंग औ जीव भुजंगी । विष बरजोर बसै तेहि संगी ॥
नेत्र गुञ्ज ए ऊंच लिलारा । कामलहरि बहु जहर पसारा ॥
हंसत वदन चालै चतुरंगा । बोधत ताहि होत सुख भंगा ॥
नैन शेष निरखे जेहि ओरा । ताकह कष्ट देह तन चोरा ॥
शुभ रंगुत्र होई विषखानी । क्षीरे छिर विष बालककी हानी ॥
सो गुण छांडे तासु शरीरा । द्वादश कँवल बसै बलवीरा ॥
नाभिकमल होइ रेखा तीनी । वाएँ अङ्ग होए शशि हीनी ॥
कच्छदीप होइ गुञ्ज चितेरा । परसत ताहि कालको चेरा ॥
जङ्घदीप होइ गुञ्ज गहीला । लहसन मासा होइ जो ईला ॥
तेहि परसै औ बेघे जानी । गुरु शिष्य दोनोंकी हानी ॥
मीनहि द्वीप विकट होइ रेखा । ताके अङ्ग कालकी रेखा ॥
बाँझ मुआ बछ गूगी होई । कलपत जाय कालपुर रोई ॥