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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1674

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बोधसागर

जे मुनि लगत सँवारे बीरा । उत्पति के सँग तजै शरीरा ॥
बाकी जवनिकाल लखि राखा । मेटै अंक कालकी शाखा ॥
उत्पति होत लिखे यमराया । सो सब दीसे नरकी काया ॥
सातों द्वीप लखे सहिदानी । वासिल बाकी कर्म निसानी ॥
जेतिक श्वास चलै नर देहा । ताकर जाने सबै सनेहा ॥
दम विस्तार लिखे सब दाऊ । पाछे करै करे जे घाऊ ॥
द्वीप द्वीपकर अंग जलावै । करपग परलो प्रकट दिखावै ॥
चौरासी लक्ष योनिनकी धारा । नरकी देह ते कर्म अपारा ॥
चौरासीकर पातक भारी । नरकी देह सब लिखे विचारी ॥
करपाछै वासिल लिखि राखै । बाकी अंक मध्यमें भाखै ॥
जमा शीसपर लिखे विचारी । नित उठीके न्यावे निर्बारी ॥
सातों द्वीप सुधारै रेखा । ऐसा यमकर वरवस देखा ॥
करमज चारि अंक लिखि देई । पाछे सबसों निरगै लेई ॥
रेखा इलालि लिखे विष पूजा । लहसन मसा लिखे तिलगूजा ॥
चक्र लिखै औ आपहि बासै । सन्धि लिखै जीवन कहैं फासै ॥
नखशिख लिखै कर्मकी खानी । गुण औगुण नहिं मेटे जानी ॥
जाहि द्वीप जस अंक लिखावै । तहाँ तहाँ तस चाल चलावै ॥
रवि शशि अंक दोउ लिखि लेई । पाछे दोष जीव कहैं देई ॥
श्वासा स्नेह लिखै सहि दानी । पाप पुण्य भुगतावे जानी ॥
जेमुनि लगन होय उत्पानी । लगन केतुकी सबही हानी ॥
दोऊ लगत साथै शशि सुरा । पावै सत गुरु हाल हजुरा ॥
जो गुरु मिलै तो मेटे रारी । बिन सतगुरु सब यमकी बारी ॥
सतगुरु बिना न होय उबारा । केतो ज्ञान कथै संसारा ॥
जप तप योग यज्ञ व्रत पूजा । काल सनेह और नहिं दूजा ॥