सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1665, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1665

श्वासयुञ्जार

( ५५ )

कीलक युगकी श्वास सारा । छहसै सत्रे पाँच सुधारा ॥
एति श्वासा कीलक युग माहीं । परसे जीव अघरकी छाहीं ॥
बीतत घरी गरज चहराई । काल टकोरा मारे धाई ॥
इह युग अन्त कहावे घरी । नागिनि आसे सन्मुख खरी ॥
प्रथम कीलक होय संधारा । पाछे युगका मत रित्तारा ॥
सतयुग धरि दूसर जब आवै । तेहि श्वास कमत युग पावै ॥
कमत युग होइ कोधवरियारा । उत्पति थोर बहुत संधारा ॥
कमत युगकी श्वासा जाने । छः सै सत्रह पाँच बखानै ॥
एतिक श्वासा कामत युगमाहीं । गुण अवगुण दोछ निरखेहु ताहीं ॥
बीतत कामतक मोद युग आवै । तिसरी घरी वासना धावै ॥
आवा गौन विचारि कोई । युग कमोद सुख पावै सोई ॥
तिसरी घरी सतयुगके आई । तब कमोद युग होय सहाई ॥
युग कमोद सतयुग मई आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥
युग कमोदकी परलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥
तब जो होई सूर्य संचारा । महाविरोध उपजे अधिकारा ॥
चन्द सनेह होय जो हीना । महासुफल तन होय मलीना ॥
श्वासा चलै सातसै भारी । युग कमोदकी कथनी हैन्यारी ॥
युग कंकवत कि होय प्रकाशा । अतिही दुर्ज विषयकी त्रासा ॥
चौथी घरी कोध बेकारा । महा कठिन होई ताकी धारा ॥
चौथी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥
सतयुग अंत होय नहीं पावै । युग कंकवत आय शिरनावे ॥
युत कंकवतकाल बरिआरा । कायाके बहु करै विकारा ॥
काया कहर गरासै आई । तब न भेद मैं कहौ बुझाई ॥
काया कहर हो परचण्डा । नख शिख व्यापि रहै नौखण्डा ॥