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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 166

( ३८ )

अनुरागसागर

उनसे और सुनैँ जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहाँ परमाना॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्द काल मुख जेहै॥
देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटै हैं॥
जा कहा शिष्य करै पुनि जाई । परमारथ तिहि नहिं लखायी॥
परमारथके निकट न जेहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं॥
आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दृढ़ै हैं॥
आप ऊंच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूर्छित महीकर धारा ॥

अद्याकागायत्रीको शाप देना

गायत्री जान्यो तेहि वारा । हुए है तोर पंच भरतारा ॥
गायत्री तोर होई वृषभ भर्तारि । सांत पांच और बहुत पसारि॥
धर औतार अखज तुम खायी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥
निजस्वारथ तुम मिथ्या भारी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥
मानि शाप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तबचितवन कीन्ही॥

अद्याका सावित्री को शाप देना

पुढुपावति निजमान धरायेहु । मिथ्या कहनिजजन्मनशायेहु॥
सुनहुपुष्पावतितुम्हरोविश्वासा । नहिं पूजिहैं तुम्हसे कछु आशा॥
होय कुगंध ठौर तव बासा । भुगतहु नरक कामगहि आशा॥
जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरौ औतारा । कयोडा केतकी नाम तुम्हारा॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति छन्द

भये शापवश तीनों विकलमति, हीनछीन कुकर्मते॥
यह काल कलाप्रचंडकामिनि, डस्यो सब कहैं चर्मते ॥