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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1654

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बोधसागर

जब दश पाँच गुफामहँ आवहि । मधुरी तान अर्धधुनिगावहि ॥
कोई घंटा कोह ताल बजावहि । कोई शंखनाद कोई झालरिलावहि ॥
कोई किंकिनिचिचिनिकिन्नरिवीना । कोई भेरिभृदंग औढोलसहीना ॥
कोई तारी कोई बेन बजावहि । रहसि रहसि नानागुणगावहि ॥
सारंग जल तरंग धुनिधारी । तबलाचहुँ ओरनरसिगाडफारी ॥
इहिविधि भोरगुफा धुनि गाजै । नानारंग मधुर धुनि बाजै ॥
बाजे बाजन होइ धुनि गाजा । बिछुली चमके मोहै राजा ॥
दश औ पाँच पचीस समावै । तब घरनी घरियार बजावै ॥
पांच पचीस दश दशहि समावै । गुफाके ऊपर सुरली बजावै ॥
बाजै सुरली कला अनन्ता । जागै कमला सो मैं मन्ता ॥
निर्झर झरे गुफाके द्वारा । रवि शशिपांचतत्त्वउजियारा ॥
श्वासा सार सहज घर वासा । रविशशि पांचतत्त्व परकाशा ॥
और गुफामहँ बाजन बाजै । रवि शशि श्वासासंयमगाजै ॥

समय-नाना बाजन बाजहीं, नानारंग अपार ।

मन औ जिव इक संगहीं, अविनाशीके द्वार ॥

चौपाई

मन नाचै पल लै औ गावै । आप नाचिके जिवहि नचावै ॥
जीव नचै अविनाशी आगे । मन जिव रहे सदा संगलागे ॥
आनंदधाम होत दिनराती । दीसे ज्योति दीवा बिखुबाती ॥
सुरली बाजै निर्झर झरे । नाडी सुषम मन्दिर भरे ॥
निर्भय सदा न जाति अजाती । निर्वश सदा न पूजा पाती ॥
स्वर्ग नर्क औ नदी है ताहाँ । ज्योति उजागर निर्गुण नाहाँ ॥
सरगुण निरगुण एके माहा । दीखै ज्योति निरंजन ताहा ॥
सात तीन पाँचों जब एका । दुइ घर वास एक घर ठेका ॥
उतरि गुफासे जब घर आवै । आपु आपु कहचहुँ दिश धावै ॥