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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1652

( ४२ )

बोधसागर

उड़ि अकाश तरुवर फलखाहीं । पानी उत्तरि पीवै जगमाहीं ॥
जो चन्दा घर चन्दा आवै । तो चन्दा सत्यलोक सिधावै ॥
मान सरोवर पैठि नहावै । विष तजि अमृत घर ले आवै ॥
पुष्प द्रौप होय फिरि घर आवै । पुष्प द्रौपमहँ जाय समावै ॥
एहि विधि चन्द्रग्रहणको देखे । चन्द्र अंशकी श्वास बिवेखे ॥
आयु अंश श्वासा महँ पावै । तो चन्दा नहि मूल गमावै ॥
अंश जो आयु घरहिफिरिआवै । पूरी तत्व सदा सुखपावै ॥
उग्रह होते सुरघर आवै । तादिन चंदा मूल गमावै ॥
एहि विधि सूर सतावे काला । ग्रहण गरासि करे जंजाला ॥
उग्रह होते श्वास विवेखे । शशि औ सुर दोऊ घर देखे ॥
जहाँ पीवै पानी सब आवै । तहाँ दूतलै फंदा लावै ॥
एक तरुवर बनलासा लावहि । एकजल पीत चुगत सँतावहि ॥
एक पींजरा महँ जीव आवहि । रामनाम कह सदा पढावहि ॥
एक अमृत मुक्ताफल खाही । एकजलाहारफलआनिअघाही ॥
एक जीव मारिकै करै अहारा । एक जीव जीवहि कर चारा ॥
एक जोने बल बजाये अधीना । एकउज्वलजल ज्योतिमलीना ॥
जीव एकमत बहुत अपारा । एकउज्वलजलज्योतिअपारा ॥
श्वासा तेजी ज्ञानगा देहा । काम कलाते बहुत सनेहा ॥
अंडज देह महाबल भारी । वचन बिचारि करै सब झारी ॥
शुभ औ अशुभ दुही हैं ताहीं । एक मधुर एक तेज सुहाहीं ॥
एक सुहावन वचन सुनावहि । एक अपावन सुनतन भावहि ॥
तीनलोक भरि रहा समार्ई । ज्ञान गुमान करे सेवकाई ॥
त्रिविध ज्ञान लीए तन डौले । ऋतुऋतु बिरहका लिपै बोले ॥
तेजहीन नाना दशा कीन्हार् । ताकर भेद न काहू चीन्हार् ॥